तिल-तिल बढ़ते हैं बाबा तिलभांडेश्वर, 2500 साल पुराने शिवलिंग का अद्भुत रहस्य, सावन में उमड़ते हैं श्रद्धालु
बाबा तिलभांडेश्वर का तिल से अभिषेक और दीपदान की है विशेष मान्यता
पांडे हवेली में विराजमान स्वयंभू शिवलिंग से जुड़ी हैं कई पौराणिक मान्यताएं
मकर संक्रांति पर तिल के दाने के बराबर बढ़ता है शिवलिंग का आकार
रिपोर्ट - ओमकार नाथ
वाराणसी। काशी को देवाधिदेव महादेव की नगरी कहा जाता है। यहां कदम-कदम पर प्राचीन शिवालय और उनसे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं देखने को मिलती हैं। इन्हीं में एक प्रमुख मंदिर है भेलूपुर क्षेत्र के पांडे हवेली स्थित श्री तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां विराजमान स्वयंभू शिवलिंग हर वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर तिल के एक दाने के बराबर बढ़ता है। इसी मान्यता के चलते बाबा का नाम तिलभांडेश्वर पड़ा। सावन माह में यहां विशेष दर्शन-पूजन के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय मान्यताओं में इस शिवलिंग को करीब 2500 वर्ष पुराना बताया जाता है। मान्यता है कि यह शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ था। शिवपुराण और स्कंदपुराण से भी इसके जुड़ाव की बात कही जाती है। मंदिर की प्राचीनता और स्वयंभू शिवलिंग से जुड़ी मान्यताएं इसे काशी के प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल करती हैं।

शिवलिंग के तिल-तिल बढ़ने की मान्यता
बाबा तिलभांडेश्वर के नाम और स्वरूप से जुड़ी सबसे खास मान्यता उनके आकार को लेकर है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मकर संक्रांति के दिन शिवलिंग में तिल के एक दाने के बराबर वृद्धि होती है। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और इसी कारण बाबा को तिलभांडेश्वर कहा जाता है।

ऋषियों की तपोस्थली से जुड़ी कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार यह स्थान ऋषियों की तपोस्थली रहा है। मान्यता है कि महर्षि जाबालि अथवा विभाण्ड ऋषि ने यहां कठोर तपस्या की थी। उन्होंने वर्षों तक तिल का सेवन करते हुए भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और स्वयंभू शिवलिंग के रूप में यहां विराजमान हुए। कुछ धार्मिक मान्यताओं में मां शारदा की तपस्या का भी इस स्थान से संबंध बताया गया है।

विशाल स्वरूप में विराजमान हैं बाबा
मंदिर के गर्भगृह में स्थापित स्वयंभू शिवलिंग लगभग 3.5 फीट ऊंचा और आधार का व्यास करीब 3 फीट बताया जाता है। शिवलिंग का स्वरूप और विशालता श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

तिल से पूजन का विशेष महत्व
बाबा तिलभांडेश्वर को तिल अर्पित करने, तिल के तेल का दीपक जलाने और तिलोदक से अभिषेक करने की विशेष धार्मिक मान्यता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इससे पापों का क्षय होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और पुण्य की प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति, सावन और महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में विशेष भीड़ रहती है।
काशी के केदारखंड में विराजमान
धार्मिक मान्यता के अनुसार काशी को विश्वेश्वर खंड और केदार खंड में विभाजित किया गया है। तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर केदार खंड में स्थित है, जबकि श्री काशी विश्वनाथ मंदिर विश्वेश्वर खंड का प्रमुख केंद्र है। काशी की धार्मिक परंपरा में तिल-तिल बढ़ते तिलभांडेश्वर और अंश-अंश झुकते रत्नेश्वर महादेव की मान्यता भी विशेष रूप से बताई जाती है।

पांडे हवेली में स्थित है मंदिर
श्री तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर भेलूपुर क्षेत्र के पांडे हवेली में बंगाली टोला इंटर कॉलेज के समीप स्थित है। श्री काशी विश्वनाथ धाम से इसकी दूरी करीब डेढ़ से दो किलोमीटर बताई जाती है। संकरी गलियों के बीच स्थित होने के बावजूद यहां रोजाना श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।
बाबा तिलभांडेश्वर महादेव से जुड़ी पौराणिक कथाएं और तिल-तिल बढ़ने की मान्यता आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। सावन में यहां पहुंचने वाले भक्त बाबा का जलाभिषेक कर सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की कामना करते हैं। काशी के प्राचीन धार्मिक स्थलों में शामिल यह मंदिर शहर की सनातन आध्यात्मिक परंपरा की एक विशिष्ट पहचान माना जाता है।

