काशी के अर्क विनायक गणेश : दुर्लभ स्वरूप, अद्भुत महिमा और पीढ़ियों तक फल देने वाला पुण्य
वाराणसी। सनातन धर्म में पंचदेवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शक्ति और गणेश की उपासना का विशेष महत्व है। मान्यता है कि ये पंचदेव मानव जीवन की निरंतर रक्षा करते हैं। काशी नगरी के प्राचीन और दिव्य धार्मिक स्थलों में अर्क विनायक गणेश मंदिर का विशेष स्थान है। यह मंदिर भदैनी मोहल्ले में, तुलसी घाट से महिषासुर मर्दिनी मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित है। अपनी विशिष्ट बनावट और आध्यात्मिक मान्यताओं के कारण यह मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक और ज्ञान का अधिष्ठाता देव माना गया है। शास्त्रों के अनुसार बिना विवेक और बुद्धि के मानव का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। गणेश न केवल विघ्नहर्ता हैं, बल्कि रिद्धि और सिद्धि के दाता भी हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार उनकी दो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि उनके दोनों ओर विराजमान रहती हैं, जो सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य और सफलता का प्रतीक मानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त भगवान गणेश को अष्ट सिद्धियों का स्वामी भी कहा गया है।
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता भगवान गणेश का दुर्लभ द्विरूप स्वरूप है। यहां एक साथ सटी हुई दो गणेश प्रतिमाएं विराजमान हैं, जिनमें एक का सूंड दाहिनी ओर तथा दूसरी का सूंड बाईं ओर है। यह स्वरूप अत्यंत दुर्लभ माना जाता है और देश के गिने-चुने मंदिरों में ही देखने को मिलता है। इसी कारण अर्क विनायक गणेश का महत्व अन्य गणेश मंदिरों से अलग और विशेष माना जाता है।
धार्मिक विश्वासों के अनुसार, अर्क विनायक गणेश के दर्शन और विधिपूर्वक पूजन से भक्तों के समस्त कष्ट दूर होते हैं तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु लगातार 40 दिनों तक नियमित रूप से दर्शन करता है, उसके घर में अपार धन-धान्य और सुख-वैभव आता है। इस पुण्य का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक फलदायी होता है।
स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि अर्क विनायक गणेश सच्चे मन से की गई हर प्रार्थना को स्वीकार करते हैं। विशेष रूप से गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी और बुधवार के दिन यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। दूर-दराज से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर पुनः आकर कृतज्ञता अर्पित करते हैं। काशी की यह प्राचीन धरोहर आज भी आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।

