काशी के मंदिरों में चढ़े फूलों से तैयार हो रही अगरबत्ती, देश-विदेश तक पहुंचेगी आस्था की सुगंध
मंदिरों के फूलों को नया जीवन दे रही काशी की पहल, पर्यावरण संरक्षण के साथ 80 महिलाओं को मिल रहा रोजगार
110 मंदिरों से प्रतिदिन एकत्र किए जा रहे करीब 1,000 किलो फूल और पत्तियां, रिसाइकिल कर बनाए जा रहे अगरबत्ती, धूप और हवन सामग्री जैसे उत्पाद
कोमल सिंह की पहल से आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा, महिलाओं को हर माह 8 से 10 हजार रुपये तक की आय
वाराणसी, 17 अक्टूबर। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में मंदिरों में भगवान को अर्पित किए जाने वाले फूल अब बेकार नहीं जा रहे, बल्कि उनसे अगरबत्ती, धूप और हवन सामग्री जैसे उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। काशी के लगभग 110 मंदिरों से प्रतिदिन करीब 1,000 किलो चढ़ाए हुए फूल और पत्तियां एकत्र की जाती हैं। इन्हें रिसाइकिल कर उपयोगी उत्पादों में बदला जा रहा है। इस पहल से जहां धार्मिक अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन और गंगा-वरुणा जैसी नदियों को प्रदूषण से बचाने में मदद मिल रही है, वहीं महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी तैयार हो रहे हैं। कोमल सिंह की संस्था ईजी हेल्प इस पहल के माध्यम से मंदिरों से निकलने वाले पुष्प अपशिष्ट का उपयोग कर रही है। योगी सरकार की मिशन शक्ति और महिला सशक्तिकरण से जुड़ी नीतियों से प्रेरित होकर कोमल सिंह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी काम कर रही हैं।

10 मंदिरों से शुरू हुआ सफर, अब 110 मंदिरों तक पहुंची पहल
कोमल सिंह ने बताया कि एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह वाराणसी लौटीं, तो उन्हें महिलाओं के लिए काम करने का अनुकूल माहौल मिला। उनके अनुसार, प्रदेश में बेहतर कानून-व्यवस्था ने महिलाओं को घर से बाहर निकलकर काम करने के लिए सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया है।इसी दौरान उनका ध्यान काशी के धार्मिक स्थलों से निकलने वाले फूलों और अन्य धार्मिक अपशिष्ट से होने वाले प्रदूषण की ओर गया। इसके बाद उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए काम शुरू किया। नगर निगम के साथ उनकी संस्था ईजी हेल्प का मंदिरों से निकलने वाले माला-फूल एकत्र कर उनसे अगरबत्ती बनाने का अनुबंध है।कोमल सिंह के मुताबिक, शुरुआत में 10 मंदिरों से फूल एकत्र करने का काम शुरू किया गया था। अब काशी के लगभग 110 मंदिरों से फूल और पत्तियां जुटाई जा रही हैं। इनमें कई प्रमुख मंदिर भी शामिल हैं। इस काम के लिए तीन ई-रिक्शा, जिन्हें ‘पुष्प-रथ’ नाम दिया गया है, के माध्यम से मंदिरों से पुष्प अपशिष्ट एकत्र किया जाता है।

फूलों से अगरबत्ती, धूप और हवन सामग्री तैयार
एकत्र किए गए फूलों को कई चरणों में उपयोगी उत्पादों में बदला जाता है। सबसे पहले मंदिरों और धार्मिक स्थलों से फूलों का संग्रह किया जाता है। इसके बाद उनकी छंटाई कर गुणवत्ता के आधार पर अलग किया जाता है। फूलों को बिना केमिकल के प्राकृतिक तरीके से सुखाया जाता है और फिर पीसकर पाउडर तैयार किया जाता है। इस कच्चे माल से अलग-अलग उत्पाद बनाए जाते हैं।वर्तमान में संस्था की ओर से अगरबत्ती, धूप, ड्राई स्टिक धूप, हर्बल गुलाल और खाने योग्य तुलसी पाउडर जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इस तरह भगवान को अर्पित किए गए फूलों का दोबारा उपयोग कर उन्हें उपयोगी उत्पादों में बदला जा रहा है।

100 प्रतिशत पुष्प अपशिष्ट के उपयोग की दिशा में प्रयास
कोमल सिंह के अनुसार, प्रतिदिन एकत्र किए जाने वाले फूलों में से लगभग 40 से 50 प्रतिशत फूल ऐसे होते हैं, जो अगरबत्ती या धूप बनाने के लिए उपयुक्त नहीं होते। फिलहाल इस पुष्प अपशिष्ट को सुरक्षित रूप से अलग संग्रहित किया जा रहा है। भविष्य में इससे जैविक खाद यानी ऑर्गेनिक कम्पोस्ट तैयार करने की योजना पर काम चल रहा है।इस योजना का उद्देश्य फूलों के अपशिष्ट का अधिकतम उपयोग करना है, ताकि धार्मिक स्थलों से निकलने वाले कचरे का बेहतर प्रबंधन हो सके और पर्यावरण पर उसका प्रभाव कम किया जा सके।

80 महिलाओं को रोजगार, हर माह 8 से 10 हजार रुपये तक आय
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिला सशक्तिकरण भी है। कोमल सिंह के मुताबिक, इस कार्य से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 70 से 80 महिलाओं को रोजगार मिल रहा है। इन महिलाओं की मासिक आय करीब 8 से 10 हजार रुपये है।इस पहल के जरिए महिलाओं को आजीविका का अवसर मिल रहा है। साथ ही, मंदिरों से निकलने वाले फूलों का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन को एक साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।

आस्था, पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण का संगम
नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल के अनुसार, यह पहल आस्था, पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण के बीच एक मजबूत सेतु का काम कर रही है। इससे धार्मिक अपशिष्ट के प्रबंधन की समस्या के समाधान के साथ महिलाओं को सम्मानजनक और स्थायी रोजगार उपलब्ध कराने में मदद मिल रही है।काशी में मंदिरों से एकत्र किए गए फूलों को उपयोगी उत्पादों में बदलने की यह पहल धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण को साथ लेकर चल रही है।



