169 साल बाद अजनाला के शहीदों की पहचान की नई उम्मीद, तमिलनाडु से आए वंशजों ने बीएचयू की ज्ञान लैब में दिए डीएनए सैंपल

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1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के वीरों के परिजनों की तलाश में वैज्ञानिकों का बड़ा कदम, प्राचीन डीएनए से होगा मिलान
 

रायबरेली से तमिलनाडु तक पलायन की ऐतिहासिक कड़ी जोड़ने की कोशिश, बीएचयू की ज्ञान लैब में महत्वपूर्ण शोध
 

गिरफ्तारी और अंग्रेजों की यातना से बचने के लिए दक्षिण भारत की ओर किया था पलायन 
 

2012 में अजनाला के कालियानवाला कुएं की खुदाई में मिले थे मानव कंकाल और अस्थियां 

वाराणसी। वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अजनाला (पंजाब) में शहीद हुए सैनिकों की पहचान और उनके वंशजों तक पहुंचने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की ज्ञान लैब में बुधवार को तमिलनाडु के कृष्णगिरी जिले के सन्थूर गांव से पहुंचे चार लोगों ने स्वेच्छा से अपने डीएनए (सलाइवा) सैंपल दिए। वैज्ञानिक अब इन नमूनों का मिलान अजनाला से मिले शहीदों के प्राचीन डीएनए प्रोफाइल से करेंगे, जिससे यह पता लगाया जा सके कि क्या उनका संबंध 1857 के उन अमर सेनानियों से है।

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अजनाला हत्याकांड का दर्दनाक इतिहास
1 अगस्त 1857 को पंजाब के अजनाला स्थित कालियानवाला कुएं में ब्रिटिश सेना ने 26वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोही भारतीय सैनिकों की निर्मम हत्या कर उनके शव कुएं में फेंक दिए थे। यह घटना प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक मानी जाती है।

वर्ष 2012 में इतिहासकार सुरेन्द्र कोचर के नेतृत्व में हुई खुदाई के दौरान कुएं से मानव कंकाल, गोलियां, सैन्य एपॉलेट और ईस्ट इंडिया कंपनी के सिक्के बरामद हुए। इसके बाद भारतीय वैज्ञानिकों की टीम ने इन अवशेषों पर आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से अध्ययन शुरू किया।

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डीएनए और वैज्ञानिक अनुसंधान से मिली नई दिशा
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे, डॉ. नीरज राय, डॉ. के. थंगराज और डॉ. जे.एस. सेहरावत सहित वैज्ञानिकों की टीम ने दांतों और हड्डियों से प्राप्त नमूनों का डीएनए एवं स्टेबल आइसोटोप विश्लेषण किया। अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि ये सैनिक पंजाब के निवासी नहीं थे, बल्कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों, विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार से भर्ती होकर सेना में शामिल हुए थे।

 

इसके बाद वैज्ञानिकों ने शहीदों के परिजनों की खोज शुरू की, लेकिन ब्रिटिश शासन के अभिलेखों से कोई ठोस जानकारी नहीं मिल सकी। ब्रिटिश पक्ष ने यह कहकर रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई कि उस समय शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन था।

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रायबरेली से तमिलनाडु तक जुड़ा इतिहास
शोध के दौरान यह जानकारी सामने आई कि अजनाला की घटना के बाद ब्रिटिश शासन ने विद्रोही सैनिकों के परिवारों पर भी अत्याचार किए। गिरफ्तारी और उत्पीड़न से बचने के लिए उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दुमताहर गांव से कई परिवार दक्षिण भारत की ओर पलायन कर गए। इन्हीं परिवारों में पांडे परिवार भी शामिल था, जिसने तमिलनाडु के कृष्णगिरी जिले के सन्थूर गांव में अपना नया बसेरा बनाया। परिवार की परंपरा के अनुसार उनके पूर्वज 1857 के बाद सन्थूर पहुंचे थे। प्रकाश पांडे को अजनाला के विद्रोही सैनिकों के प्रमुख नेताओं में भी माना जाता है।

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अब न्यूक्लियर डीएनए से होगा मिलान
इंजीनियर समीर पांडे, जो वर्ष 2003 से कनाडा के टोरंटो में रह रहे हैं, ने अपने पारिवारिक इतिहास के आधार पर प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे से संपर्क किया। इसके बाद वैज्ञानिकों ने शोध को आगे बढ़ाते हुए अजनाला के 50 शहीदों का माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए डेटा तैयार किया। अब अधिक सटीक परिणाम के लिए न्यूक्लियर डीएनए आधारित अध्ययन किया जा रहा है।

इसी कड़ी में सन्थूर गांव से आए कार्तिकेश राजाराम तिवारी सहित चार लोगों ने ज्ञान लैब में अपने डीएनए नमूने दिए हैं। इन नमूनों का प्राचीन डीएनए से मिलान होने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि उनका संबंध अजनाला के किसी शहीद से है या नहीं।

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