45 डिग्री में 50 डिग्री जैसा टॉर्चर: हरियाली के विनाश ने बनारस को बनाया ‘कंक्रीट की भट्ठी’
वाराणसी। इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है। मौसम विभाग भले तापमान 45 डिग्री के आसपास बता रहा हो, लेकिन बनारसवासियों को यह तपिश 50 डिग्री जैसी महसूस हो रही है। दिन में सड़कें आग उगल रही हैं तो रात में उमस और गर्म हवाएं लोगों की बेचैनी बढ़ा रही हैं। हालात ऐसे हैं कि पंखे और कूलर भी राहत देने के बजाय गर्म हवा फेंकते नजर आ रहे हैं।

हरियाली खत्म, बढ़ती गई गर्मी
कभी पेड़ों की घनी छांव और ठंडी हवाओं के लिए पहचाने जाने वाला बनारस अब तेजी से कंक्रीट के जंगल में बदलता जा रहा है। सड़क चौड़ीकरण, मॉल, अपार्टमेंट और व्यावसायिक निर्माणों के बीच शहर की हरियाली लगातार कम होती गई। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो दशकों में हजारों पेड़ कटने से शहर का प्राकृतिक तापमान संतुलन बिगड़ गया है।

रात में भी नहीं मिल रही राहत
शहर के लंका, रविन्द्रपुरी, कैंट, गोदौलिया और चौक जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में हालात ज्यादा खराब हैं। यहां कंक्रीट की इमारतें और डामर की सड़कें दिनभर गर्मी सोखती हैं और रात में उसे बाहर छोड़ती रहती हैं। यही वजह है कि रात का तापमान भी सामान्य से कई डिग्री अधिक बना हुआ है।
“अर्बन हीट आइलैंड” बनता जा रहा शहर
विशेषज्ञों के मुताबिक बनारस में “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। संकरी गलियां, ऊंची इमारतें और हवा के रास्तों का बंद होना गर्मी को शहर के भीतर कैद कर देता है। पहले बांस और खपरैल की छतें प्राकृतिक ठंडक देती थीं, लेकिन अब सीमेंट-कंक्रीट की छतें घरों को भट्ठी में बदल रही हैं।
अस्पतालों में बढ़ रहे मरीज
भीषण गर्मी का असर स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई दे रहा है। डॉक्टरों के अनुसार हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और त्वचा संबंधी बीमारियों के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। अस्पतालों में गर्मी से प्रभावित लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

कागजों तक सीमित पौधरोपण
हालांकि प्रशासन की ओर से हर साल बड़े पैमाने पर पौधरोपण के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर अलग दिखाई देती है। लगाए गए कई पौधे देखभाल के अभाव में सूख जाते हैं, जिससे हरियाली बढ़ाने की योजनाएं असरदार साबित नहीं हो पा रहीं।
विकास मॉडल पर बड़ा सवाल
बनारस की यह तपिश सिर्फ एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और पर्यावरणीय असंतुलन पर बड़ा सवाल है। यदि विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई और कंक्रीट का विस्तार इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में हालात और भयावह हो सकते हैं।
अब भी संभलने का वक्त
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि बड़े स्तर पर वृक्षारोपण, पुराने पेड़ों के संरक्षण और हरित शहरी नियोजन पर गंभीरता से काम किया जाए, तो बनारस को फिर से ठंडी हवाओं और हरियाली वाली नगरी बनाया जा सकता है। वरना आने वाली पीढ़ियों को और ज्यादा तपते शहर में जीने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

