सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय का 44वां दीक्षांत महोत्सव सम्पन्न, 11,959 विद्यार्थियों को मिली उपाधि
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल बोलीं- भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत और आधुनिक तकनीक के समन्वय से बनेगा विकसित भारत-2047
44वें दीक्षांत महोत्सव में 11,959 विद्यार्थियों को उपाधियां, 29 मेधावियों को 51 स्वर्ण पदक
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने भारतीय ज्ञान परंपरा और पांडुलिपि संरक्षण पर दिया विशेष जोर
पद्मश्री प्रो. आशुतोष शर्मा ने संस्कृत और आधुनिक विज्ञान के समन्वय को विकसित भारत की आधारशिला बताया
उच्च शिक्षा मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय ने संस्कारयुक्त शिक्षा और माता-पिता के सम्मान का संदेश दिया
डिजिलॉकर के माध्यम से विद्यार्थियों को डिजिटल उपाधियां प्रदान की गईं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, शिक्षक सम्मान के साथ समारोह का समापन
वाराणसी। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय का 44वां दीक्षांत महोत्सव बुधवार को ऐतिहासिक मुख्य भवन में गरिमापूर्ण वातावरण में आयोजित हुआ। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय की कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत, संस्कृति और आधुनिक शिक्षा के समन्वय का संदेश दिया गया। समारोह में 11,959 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं, जबकि 29 मेधावी विद्यार्थियों को 51 स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया गया। इनमें 17 छात्र और 12 छात्राएं शामिल रहीं।

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि काशी केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, संस्कृत और आध्यात्मिक चेतना का शाश्वत केंद्र है। उन्होंने कहा कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वेद, उपनिषद, दर्शन, व्याकरण, आयुर्वेद, योग और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण का अग्रणी केंद्र है। उन्होंने दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण और शोध कार्यों को गति देने के लिए प्रधानमंत्री के 'ज्ञान भारत मिशन' तथा विश्वविद्यालय के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कार और उत्तरदायी नागरिक का निर्माण होना चाहिए।

मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. आशुतोष शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम प्रौद्योगिकी के इस दौर में संस्कृत, भारतीय दर्शन और विज्ञान के समन्वय से विकसित भारत-2047 का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय में संरक्षित पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली को आधुनिक अनुसंधान से जोड़ने पर बल दिया। विशिष्ट अतिथि एवं प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय ने विद्यार्थियों से कहा कि स्वर्ण पदक केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि माता-पिता, गुरु और समाज के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि संस्कारयुक्त शिक्षा ही मजबूत समाज और विकसित राष्ट्र की आधारशिला है।

समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन, वैदिक मंगलाचरण, विश्वविद्यालय कुलगीत और शैक्षणिक शोभायात्रा के साथ हुआ। कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने स्वागत भाषण में कहा कि गुरु पूर्णिमा पर आयोजित यह दीक्षांत समारोह विश्वविद्यालय के इतिहास का गौरवपूर्ण क्षण है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान से जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।
दीक्षांत समारोह में विद्यार्थियों को डिजिलॉकर के माध्यम से उपाधियां उपलब्ध कराई गईं। पीएचडी उपाधिधारियों, मेधावी छात्रों तथा चयनित शिक्षकों को सम्मानित किया गया। विश्वविद्यालय की उपलब्धियों पर आधारित लघु फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया। गोद लिए गए पांच गांवों के बच्चों ने पर्यावरण, राष्ट्रभक्ति और लोक संस्कृति पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। सोनभद्र के आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए शिक्षण सामग्री, एचपीवी जागरूकता सामग्री और पुस्तकों का भी वितरण किया गया। समारोह का समापन राष्ट्रगान और शैक्षणिक शोभायात्रा के साथ हुआ।

