खोजवां की 110 साल पुरानी रामलीला : श्रीराम ने भंग किया शिवधनुष, माता जानकी ने प्रभु को पहनाई वरमाला, लक्ष्मण-परशुराम संवाद का प्रभावशाली मंचन 

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वाराणसी। काशी की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेज रही खोजवां बाजार की श्रीरामलीला में धनुष यज्ञ का भव्य मंचन किया गया। बेसिक प्राथमिक विद्यालय परिसर में आयोजित लीला में भगवान श्रीराम द्वारा शिवधनुष भंग करने, श्रीराम-जानकी जयमाल, रावण-बाणासुर संवाद और लक्ष्मण-परशुराम संवाद के प्रसंगों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय और सजीव संवादों के बीच पूरा परिसर जय श्रीराम के उद्घोष से गूंजता रहा।

करीब 110 वर्षों से आयोजित हो रही खोजवां बाजार की यह रामलीला क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लीला देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक पहुंचे। पारंपरिक शैली में प्रस्तुत प्रसंगों के माध्यम से कलाकारों ने धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन का संदेश दिया।

स्वयंवर में श्रीराम ने तोड़ा शिवधनुष
धनुष यज्ञ के प्रसंग में राजा जनक के दरबार में माता सीता के स्वयंवर का दृश्य प्रस्तुत किया गया। स्वयंवर में पहुंचे अनेक राजा-महाराजाओं ने भगवान शिव के विशाल धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन सभी असफल रहे। इससे राजा जनक चिंतित हो उठे।

इसी दौरान गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर भगवान श्रीराम धनुष के पास पहुंचे। उन्होंने सहजता से शिवधनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते ही उसे भंग कर दिया। धनुष टूटने की गूंज के साथ सभा जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठी। इसके बाद माता जानकी ने श्रीराम के गले में जयमाल डालकर उन्हें पति के रूप में स्वीकार किया। इस दृश्य पर श्रद्धालुओं ने जयकारे लगाए।

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रावण-बाणासुर संवाद ने बढ़ाया रोमांच
रामलीला में रावण और बाणासुर के बीच संवाद का भी मंचन किया गया। कलाकारों ने ओजपूर्ण संवादों और भाव-भंगिमाओं के जरिए प्रसंग को रोचक बनाया। पात्रों की वाकपटुता और पारंपरिक अभिनय शैली ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।

लक्ष्मण-परशुराम संवाद बना आकर्षण
शिवधनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम जनक दरबार पहुंचे। टूटे धनुष को देखकर वे क्रोधित हो गए और उसे तोड़ने वाले के बारे में पूछने लगे। इसके बाद लक्ष्मण और परशुराम के बीच तीखा संवाद शुरू हुआ। लक्ष्मण के निर्भीक और व्यंग्यपूर्ण जवाबों तथा परशुराम के क्रोधपूर्ण संवादों ने दर्शकों को बांधे रखा।

स्थिति को गंभीर होते देख भगवान श्रीराम ने विनम्रतापूर्वक हस्तक्षेप किया और परशुराम से लक्ष्मण की भूल क्षमा करने का आग्रह किया। इस प्रसंग के जरिए श्रीराम के धैर्य, विनम्रता और बड़ों के प्रति सम्मान की भावना को दर्शाया गया।

पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा
रामलीला के लीला मंत्री रत्नेश पाठक ने बताया कि खोजवां बाजार की रामलीला की परंपरा करीब 110 वर्षों से निरंतर चली आ रही है। इसका उद्देश्य धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखना और भगवान श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि रामलीला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को सदाचार, मर्यादा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला माध्यम भी है।

धनुष यज्ञ सहित विभिन्न प्रसंगों के मंचन के दौरान परिसर में श्रद्धा और भक्ति का माहौल बना रहा। आयोजन ने एक बार फिर नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और रामायण की शिक्षाओं से जोड़ने का संदेश दिया।

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