पारिवारिक विरासत से मिली निशानेबाजी, अब एशियाई खेलों में चमकने को तैयार राइजा
नई दिल्ली, 14 अगस्त (हि.स.)। चंडीगढ़ की 22 वर्षीय निशानेबाज राइजा ढिल्लों के लिए शूटिंग का सफर किसी शूटिंग रेंज से नहीं, बल्कि परिवार की उस विरासत से शुरू हुआ जिसमें पीढ़ियों से बंदूकें रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रही हैं।
हरियाणा के शामगढ़ में शिकार की पारिवारिक परंपरा के बीच पली-बढ़ी राइजा अब भारत की एशियाई खेल टीम का हिस्सा हैं और पहली बार इस महाद्वीपीय प्रतियोगिता में सीनियर महिला स्कीट स्पर्धा में उतरेंगी।
राइजा के पिता ने जब वह 12 साल की थीं, तब उन्हें शूटिंग आजमाने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में यह सिर्फ शौक के तौर पर था, लेकिन जल्द ही उनकी प्रतिभा ने इसे गंभीर खेल का रूप दे दिया।
राइजा ने एक आधिकारिक बयान में कहा, “हमारे घर में हमेशा बंदूकें रही हैं। यह हमारे परिवार की विरासत का हिस्सा है। मेरे पिता चाहते थे कि मैं सिर्फ मनोरंजन के लिए शूटिंग आजमाऊं और देखें कि इसमें मेरी रुचि बनती है या नहीं। वास्तव में यहीं से मेरी शुरुआत हुई।”
10 मीटर एयर राइफल से शुरू हुआ सफर
कम उम्र में भारी उपकरण संभालना मुश्किल होने के कारण राइजा ने शुरुआत 10 मीटर एयर राइफल से की। 16 साल की उम्र में उन्होंने शॉटगन का रुख किया। यह बदलाव उनके माता-पिता और कोच की योजना का हिस्सा था, क्योंकि तब तक वह भारी उपकरण संभालने के लिए पर्याप्त उम्र की हो चुकी थीं।
उन्होंने कहा, “हम हमेशा से शॉटगन करना चाहते थे, लेकिन उस उम्र में बंदूक मेरे लिए बहुत भारी थी। मेरे माता-पिता और कोच को लगा कि तब इसके लिए सही समय नहीं है। इसलिए मैंने पहले राइफल में प्रशिक्षण लिया और कुछ प्रतियोगिताओं का अनुभव हासिल करने के बाद शॉटगन में आई।”
राइजा के पिता व्यवसायी और कृषि से जुड़े हैं, जबकि उनकी मां गांव की सरपंच हैं। शुरुआत में मां अपनी इकलौती बेटी के लगातार बाहरी खेल में रहने को लेकर थोड़ी चिंतित थीं। हालांकि, राइजा की सफलता और खेल के प्रति उनके जुनून ने उनकी सोच बदल दी।
राइजा ने कहा,“मेरे पिता बहुत उत्साहित थे, क्योंकि यह उनका विचार था। मेरी मां शुरुआत में थोड़ी सतर्क थीं और नहीं चाहती थीं कि मैं हर समय इस तरह के आउटडोर खेल में रहूं। लेकिन धीरे-धीरे जब मैं अच्छा प्रदर्शन करने लगी और मुझे खुशी मिलने लगी, तो मेरी खुशी में ही उन्हें भी खुशी मिलने लगी,”
बचपन में खुद को अंतर्मुखी बताने वाली राइजा का मानना है कि शूटिंग ने सिर्फ उनके खेल को ही नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व को भी बदल दिया।
उन्होंने कहा, “शॉटगन चलाने में कुछ ऐसा है जो आपको आत्मविश्वास और सशक्त होने का एहसास कराता है। इतने सालों बाद भी यह मुझे रोमांचित करता है। इस खेल ने मेरा आत्मविश्वास और जिंदगी को देखने का मेरा पूरा नजरिया बदल दिया है।”
हालांकि इस सफर में दबाव भी कम नहीं रहा। महज 20 साल की उम्र में 2024 में ओलंपिक कोटा हासिल करने के बाद उन्हें पेरिस ओलंपिक टीम में अपनी जगह बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। वह दौर उनके करियर के सबसे कठिन समय में से एक रहा।
राइजा ने कहा, “इतनी कम उम्र में ओलंपिक में प्रतिस्पर्धा करने का तनाव संभालना मुश्किल था। लेकिन यह मेरे लिए सीखने का भी एक अनुभव था और इसने मुझे एक मजबूत इंसान बनाया।”
राइजा ने भारतीय राष्ट्रीय राइफल संघ (एनआरएआई) की व्यवस्थित प्रशिक्षण व्यवस्था को भी अपनी सफलता में अहम बताया। उनके मुताबिक प्रशिक्षण शिविरों में गोला-बारूद, क्ले टारगेट और विशेषज्ञ कोचिंग जैसी सुविधाओं ने निशानेबाजों को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने में मदद की है।
उन्होंने कहा, “एनआरएआई की ओर से आयोजित शिविर हमारे लिए बदलाव लाने वाले साबित हुए हैं। गोला-बारूद, क्ले टारगेट और कोचों ने हम सभी को अपनी शूटिंग को बेहतर करने और अपना सर्वश्रेष्ठ देने का अवसर दिया है।”
पहली बार एशियाई खेलों में हिस्सा लेने को लेकर राइजा बेहद उत्साहित हैं। हालांकि वह नतीजे के दबाव में आने के बजाय प्रतियोगिता का आनंद लेते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहती हैं।
उन्होंने कहा, “यह मेरे पहले एशियाई खेल हैं और मैं वास्तव में बहुत उत्साहित हूं। मेरा लक्ष्य पोडियम पर जगह बनाना है, लेकिन इसके साथ ही मैं इस अनुभव का आनंद भी लेना चाहती हूं, क्योंकि जब मैं वास्तव में खुद को आनंदित रखती हूं तो मेरा प्रदर्शन स्वाभाविक रूप से बेहतर हो जाता है।”
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनील दुबे

