काशी ने खो दिया एक सितारा : अखाड़ों पर गूंज रही 'BHU कुमार' पहलवान सियाराम यादव की कहानी
वाराणसी। 2026 के शुरुआती दिनों में काशी ने जिस महान पहलवान को खोया, उसकी यादें आज भी शहर के अखाड़ों, घाटों और शिष्यों के दिलों में जीवित हैं। अस्सी निवासी, राष्ट्रीय स्तर के पहलवान और बीएचयू कुमार की उपाधि से सम्मानित सियाराम यादव पहलवान को आज काशी पूरे सम्मान और भावुकता के साथ याद कर रही है। तुलसी घाट स्थित स्वामीनाथ अखाड़ा में उनके संघर्ष, अनुशासन और कुश्ती के जुनून की चर्चा हर पहलवान की जुबान पर है।
2 जनवरी को हुआ निधन
'बीएचयू कुमार' सियाराम यादव पहलवान का 2 जनवरी को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। अंतिम संस्कार हरिशचंद्र घाट पर किया गया। मुखाग्नि उनके छोटे-छोटे पुत्र बृजमोहन यादव ने दिया। वह अपने पीछे पत्नी प्रेमशिला देवी व दो पुत्र भूपेंद्र कुमार यादव एवं बृज मोहन यादव का भरा पूरा परिवार छोड़कर गए हैं। मिर्जापुर के थाना अद्लहाट के ग्राम हाजीपुर रस्तोगिया के मूल निवासी स्वर्गीय रामकेश यादव जो असि मोहल्ले में अपना निजी आवास बना कर रहते थे। उनके छोटे पुत्र एवं पहलवान गणेश यादव के छोटे भाई सियाराम यादव काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कला संकाय से स्नातक थे। पढ़ने लिखने के साथ ही वह कुश्ती के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे और भदैनी के तुलसी घाट स्थित स्वामीनाथ अखाड़े में अपने पिताजी स्वर्गीय रामकेश यादव एवं भाई गणेश यादव के साथ जाना शुरू किया।

स्वामीनाथ अखाड़े की शान थे सियाराम पहलवान
सियाराम यादव, तुलसी घाट के प्रसिद्ध स्वामीनाथ अखाड़े के उन शिष्यों में रहे, जिनका नाम अखाड़े की पहचान बन गया। उन्होंने अपने पिता स्वर्गीय रामकेश यादव और बड़े भाई पहलवान गणेश यादव के साथ गुरुजनों की देखरेख में कुश्ती की बारीकियां सीखीं। अखाड़े के महंत और सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर विश्वम्भर नाथ मिश्र ने उन्हें स्वामीनाथ अखाड़े के सर्वश्रेष्ठ पहलवानों में गिना है।
बीएचयू से अखाड़े तक, अनुशासन और प्रतिभा की मिसाल
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कला संकाय से स्नातक सियाराम यादव पढ़ाई के साथ-साथ कुश्ती में भी समान रूप से निपुण थे। वर्ष 1985 में उन्हें बीएचयू कुमार की उपाधि मिली। इसके बाद 1988 में वे मिर्जापुर केसरी बने और 1988-89 में इंटर यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता में कुश्ती में गोल्ड मेडल हासिल किया। 62 और 68 किलो भार वर्ग में वे उत्तर प्रदेश और वाराणसी दोनों में प्रथम स्थान पर रहे।
नौकरी ठुकरा, कुश्ती को चुना जीवन का लक्ष्य
सियाराम यादव की पहचान सिर्फ एक पहलवान की नहीं, बल्कि एक समर्पित गुरु की भी थी। 1989 में रेलवे में टिकट कलेक्टर और रेलवे रेसलिंग कोच जैसे पदों के प्रस्ताव मिलने के बावजूद उन्होंने उन्हें ठुकरा दिया। उनका सपना था कि वे युवा पीढ़ी को कुश्ती के लिए तैयार करें और इस भारतीय परंपरा को देश-विदेश तक पहुंचाएं।

हाजीपुर में बनाया अखाड़ा, राज्यपाल ने किया उद्घाटन
कुछ ही महीने पहले उन्होंने अपने पैतृक गांव हाजीपुर (मिर्जापुर) में हनुमान जी व्यायाम शाला का नवनिर्माण कराया था। इस अखाड़े का उद्घाटन लक्ष्मण आचार्य ने स्वयं किया था। यह अखाड़ा आज भी उनके सपनों और मेहनत का प्रतीक बना हुआ है।
समाज सेवा में भी आगे रहे सियाराम यादव
कुश्ती के साथ-साथ वे सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहे। अस्सी स्थित पुष्कर तालाब की सफाई अभियान में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। अभियान के संयोजक समाजसेवी रामयश मिश्र के अनुसार, श्रमदान से लेकर स्वयंसेवकों की व्यवस्था तक सियाराम यादव हर मोर्चे पर आगे रहते थे।
पहलवानों की जुबान पर आज भी वही नाम
पूर्व उत्तर प्रदेश केसरी सभाजीत यादव ‘कल्लू पहलवान’ का कहना है कि अपने समय में सियाराम यादव का कोई सानी नहीं था। वे पंजाब, बिहार, राजस्थान सहित देशभर में कुश्ती लड़ने जाते और जीत दर्ज कर काशी का नाम रोशन करते थे।
आज उनके न रहने के बावजूद काशी के अखाड़ों में उनकी मेहनत, अनुशासन और जीत की कहानियां नई पीढ़ी के पहलवानों को प्रेरित कर रही हैं। सियाराम यादव पहलवान अब हमारे बीच भले न हों, लेकिन काशी की मिट्टी में उनका नाम हमेशा जिंदा रहेगा।

