मां दुर्गा की भक्ति में क्यों उड़ाया जाता है धुएं का गुबार? 'धुनुची नाच' बनने की कहानी है द‍िलचस्‍प

WhatsApp Channel Join Now

शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri 2026) की शुरुआत 11 अक्टूबर से होने वाली है। नवरात्रि के साथ देशभर में मां दुर्गा की पूजा की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं। खासकर वेस्‍ट बंगाल की दुर्गा पूजा की बात ही कुछ और होती है। इस दौरान यहां दुर्गा पूजा में सिर्फ पंडाल और मूर्तियां ही नहीं देखने को म‍िलती हैं।

ढाक की तेज आवाज, आरती और तरह-तरह की परंपराएं भी दुर्गा पूजा को खास बना देती हैं। इन्हीं में से एक है धुनुची नाच। आरती के समय हाथ में धुनुची लेकर जब लोग नाचते हैं तो उससे धुएं का गुबार निकलता है और पूरा माहौल भक्ति से भर जाता है, लेकिन क्‍या आपने कभी सोचा है क‍ि आखिर इस नृत्य में धुनुची का इस्तेमाल क्यों होता है और इसकी शुरुआत कैसे हुई? हम आपको इसकी दिलचस्प कहानी बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं-

dhunuchi dance history (1)
क्या होता है धुनुची नाच?

आपको बता दें क‍ि धुनुची मिट्टी का एक खास तरह का बर्तन होता है, जिसे बंगाल में पूजा के समय धूप जलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें आमतौर पर नारियल के सूखे छिलके और धूप जैसी चीजें जलाई जाती हैं। इससे काफी धुआं निकलता है। इसी धुनुची को हाथ में लेकर ढाक की ताल पर नृत्‍य करने की परंपरा को धुनुची नाच कहा जाता है। यह खासतौर पर दुर्गा पूजा की आरती के दौरान देखने को मिलता है। महासप्तमी से महानवमी तक होने वाली आरती में धुनुची नाच जरूर की जाती है।

मां दुर्गा की पूजा में क्यों किया जाता है धुनुची नाच?

बताया जाता है क‍ि दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा अपने मायके आती हैं। ऐसे में उनके स्वागत और खुशी में कई तरह की परंपराएं निभाई जाती हैं। धुनुची नाच भी इसी भक्ति और खुशी को दिखाने का एक तरीका माना जाता है। धुनुची में जलने वाली धूप से निकलने वाला धुआं पूजा के माहौल का हिस्सा होता है। धार्मिक मान्यता में धूप को पूजा की शुद्धता और पॉज‍िट‍िव‍िटी से भी जोड़ा जाता है। इसी वजह से आरती के दौरान धुनुची घुमाने और उसके साथ नृत्य करने की परंपरा बनी थी।

dhunuchi dance history (2)
कैसे शुरू हुआ धुनुची नाच?

अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा क‍ि धुनुची नाच की शुरुआत कैसे हुई। इसे लेकर कोई पक्की जानकारी तो नहीं म‍िलती हैं। बस एक कहानी है। माना जाता है क‍ि देवी दुर्गा और महिषासुर के युद्ध के दौरान देवी की शक्ति बढ़ाने के लिए भक्तों ने धूप जलाकर पूजा की थी। इसी परंपरा से आगे चलकर धुनुची नाच बन गया। यह परंपरा बंगाल के पुराने जमींदार परिवारों की दुर्गा पूजा से जुड़ी रही। बाद में जब दुर्गा पूजा बड़े लेवल पर लोगों के बीच होने लगी, तो धुनुची नाच भी आम लोगों के बीच पॉपुलर हो गया।

धुनुची नाच से जुड़ी खास बातें

आप प्‍वॉइंटर्स में भी वेस्‍ट बंगाल के धुनुची नाच की खास बातें जान लें। जैसे-

धुनुची का इस्तेमाल पूजा के दौरान धूप जलाने के लिए किया जाता है।
धुनुची नाच वेस्‍ट बंगाल की दुर्गा पूजा की खास पहचान बन चुका है।
महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी की आरती में इसे खास तौर पर देखा जाता है।
ढाक की थाप पर यह नृत्य क‍िया जाता है।
पहले पुरुषों की भागीदारी ज्यादा थी, अब महिलाएं भी इसमें शामिल होती हैं।

Share this story