पश्चिम एशिया संघर्ष विराम पर शशि थरूर ने शांति को बताया जरूरी, कांग्रेस ने प्रस्ताव में सरकार से नीति संशोधन की मांग की

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पश्चिम एशिया संघर्ष विराम पर शशि थरूर ने शांति को बताया जरूरी, कांग्रेस ने प्रस्ताव में सरकार से नीति संशोधन की मांग की


नई दिल्ली, 11 अप्रैल (हि.स.)। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच एक महीने से भी अधिक समय से जारी संघर्ष विराम पर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने शांति को जरूरी बताया है। उन्होंने कहा कि शांति कौन लाता है, यह मायने नहीं रखता, बल्कि शांति आना ही महत्वपूर्ण है। अगर शांति असफल होती है तो हमें उसके कारणों का गहराई से विश्लेषण करना चाहिए और देखना चाहिए कि भविष्य में हम किस तरह अलग परिणाम में योगदान दे सकते हैं।

थरूर ने कहा कि शनिवार को यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा कि भारत का हित शांति में ही है और हमें हालात पर बहुत सावधानी से नजर रखनी चाहिए। भारत को अलग-थलग रहने की बजाय सक्रिय रूप से जुड़ना चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि इन प्रयासों से शांति स्थापित हो। प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री क्षेत्र के नेताओं से लगातार संपर्क में हैं, क्योंकि यह हमारे हित में है।

उन्होंने कहा कि शांति कौन लाता है, यह मायने नहीं रखता, बल्कि शांति आना ही महत्वपूर्ण है। अगर शांति असफल होती है तो हमें उसके कारणों का गहराई से विश्लेषण करना चाहिए और देखना चाहिए कि भविष्य में हम किस तरह अलग परिणाम में योगदान दे सकते हैं। भारत का मूलभूत हित शांति और क्षेत्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में है क्योंकि शून्यता खतरनाक होती है और हमें अन्य तरीकों से भी नुकसान पहुंचाती है।

थरूर ने कहा कि भारत ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज है और क्षेत्रीय व वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में जिम्मेदार भागीदार है। इसलिए हमें निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए। पड़ोस में आग लगी हो तो हम केवल दर्शक नहीं बन सकते। हमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी, लेकिन वह भूमिका सोच-समझकर तय करनी होगी कि हमारा सबसे उपयोगी योगदान क्या हो सकता है। कभी-कभी यह योगदान मौन भी हो सकता है।

उन्होंने कहा कि आज भारत क्षेत्र में अधिक सक्रिय है। दो मंत्री दौरे पर हैं, प्रधानमंत्री लगातार फोन पर हैं और तीन मंत्री वास्तव में क्षेत्र में मौजूद हैं। यह सब बहुत अच्छा है और हमें इसे और बढ़ाना चाहिए। यही जुड़ाव हमें सक्षम बनाता है और भविष्य में बड़ी भूमिका निभाने की संभावना देता है।

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस की ओर से शुक्रवार रात जारी प्रस्ताव में कहा गया है कि राज्याध्यक्षों की हत्या, अंतरराष्ट्रीय कानून के बाहर युद्ध छेड़ना और नागरिकों तथा नागरिक अवसंरचना पर हमले, मानवता और नियम-आधारित विश्व व्यवस्था दोनों के खिलाफ घृणित अपराध हैं। कोई भी सार्थक समाधान जिनेवा कन्वेंशन्स, नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय वाचा, पेरिस समझौते और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। विशेषकर किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग पर प्रतिबंध (अनुच्छेद 2(4)) और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान (अनुच्छेद 2(3)) पर।

कांग्रेस के प्रस्ताव में कहा गया कि हम जिस अभूतपूर्व बहुसंकट का सामना कर रहे हैं, उसे देखते हुए ज़रूरी है कि भाजपा सरकार राष्ट्रीय हित को चुनावी और वैचारिक एजेंडों से ऊपर रखे और विदेश नीति विशेषज्ञों की सलाह को नज़रअंदाज़ करना बंद करे। इसके बजाय सरकार को विपक्ष को विश्वास में लेकर तत्काल नीति में संशोधन करना चाहिए और एकीकृत राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। ऐसा करने से भारत को शांति और न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक सैद्धांतिक, सक्रिय और विश्वसनीय आवाज़ के रूप में उसकी ऐतिहासिक भूमिका में फिर से स्थापित किया जा सकेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर

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