जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन पर मंथन के साथ 9वां भारत जल सप्ताह संपन्न

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जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन पर मंथन के साथ 9वां भारत जल सप्ताह संपन्न


नई दिल्ली, 25 सितंबर (हि.स.)। जलवायु परिवर्तन के बीच जल सुरक्षा, टिकाऊ जल सेवाओं और जल प्रबंधन को मजबूत करने पर जोर के साथ 9वां भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह (आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू) 2026 शुक्रवार को संपन्न हुआ। चार दिन चले आयोजन में जल क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों और संस्थानों ने जल संरक्षण में जनभागीदारी, विज्ञान एवं तकनीक के जमीनी उपयोग, संस्थागत क्षमता मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने कहा कि जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन के लिए लोगों की भागीदारी, विज्ञान एवं तकनीक को जमीनी स्तर तक पहुंचाना तथा अंतरराष्ट्रीय और संस्थागत सहयोग को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने जल जीवन मिशन के अगले चरण में पर्याप्त, नियमित, सुरक्षित और टिकाऊ पेयजल सेवाओं पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई।

22 से 25 सितंबर तक आयोजित आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू 2026 का विषय “जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन” था। इसमें नीति निर्माता, सरकारी अधिकारी, अंतरराष्ट्रीय संगठन, विकास साझेदार, शोधकर्ता, शिक्षाविद, उद्योग, जल क्षेत्र के विशेषज्ञ, नवोन्मेषक और युवा पेशेवर शामिल हुए। आयोजन में 7,224 प्रतिनिधियों, 227 प्रदर्शकों और 119 शोध-पत्र प्रस्तुतियों के साथ दो साझेदार देशों तथा 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की भागीदारी रही।

जल शक्ति राज्य मंत्री वी सोमन्ना ने कहा कि जल सुरक्षा का अर्थ सुरक्षित और भरोसेमंद पेयजल, स्वच्छता, स्वच्छ वातावरण और प्रभावी अपशिष्ट जल प्रबंधन के जरिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करना है। उन्होंने पेयजल और स्वच्छता को एकीकृत तरीके से देखने तथा ग्रे वाटर, अपशिष्ट जल और ठोस कचरे के सुरक्षित प्रबंधन पर जोर दिया।

राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने सिंचाई विकास, कमांड क्षेत्र के आधुनिकीकरण, बांध पुनर्वास, भूजल प्रबंधन और रिचार्ज, नदियों के पुनर्जीवन, नदी जोड़ो परियोजनाओं, बाढ़ प्रबंधन, जल पूर्वानुमान और जल सूचना प्रणालियों को जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन के महत्वपूर्ण हिस्से बताया। उन्होंने जल संसाधन परियोजनाओं को समय पर पूरा करने और उनके प्रभावी उपयोग पर जोर दिया।

पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के सचिव अशोक के.के. मीना ने कहा कि जलवायु अनुकूलन की शुरुआत जल लचीलेपन से होती है। उन्होंने जल चक्र को वैश्विक साझा संसाधन बताते हुए हर बूंद के संरक्षण, पुन: उपयोग और पुनर्भरण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू में हुई चर्चाओं और सामने आए समाधानों को जमीनी स्तर पर लागू करना और उनके परिणामों को मापना जरूरी है।

आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू की संक्षिप्त रिपोर्ट और प्रमुख सिफारिशें राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक राजीव कुमार मित्तल ने प्रस्तुत कीं। सात विषयगत क्षेत्रों से सामने आई सिफारिशों में सहभागी जल शासन, उपचारित अपशिष्ट जल का सुरक्षित पुन: उपयोग, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, डेटा आधारित शासन, समुदाय आधारित भूजल पुनर्भरण, डिजिटल और उभरती तकनीकों के व्यापक उपयोग, बहु-जोखिम पूर्व चेतावनी प्रणाली तथा नदी बेसिन स्तर पर जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।

आयोजन के तहत दूसरा भारत अंतरराष्ट्रीय वॉश सम्मेलन भी आयोजित किया गया। इसमें जल, स्वच्छता और स्वच्छता व्यवहार से जुड़े शोध, तकनीक और जमीनी अनुभवों पर चर्चा हुई। सम्मेलन में चार दिनों के दौरान 57 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। चर्चाओं में जल स्रोतों की स्थिरता, रखरखाव, जल गुणवत्ता, जलवायु अनुकूलन, डिजिटल तकनीक, टिकाऊ स्वच्छता और शून्य-कचरा प्रबंधन जैसे विषय प्रमुख रहे।

वॉश सम्मेलन के तहत भारत-अफ्रीका गोलमेज बैठक में 22 अफ्रीकी देशों के राजदूतों, उच्चायुक्तों और वरिष्ठ राजनयिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसमें क्षमता निर्माण, जल गुणवत्ता निगरानी, डिजिटल प्लेटफॉर्म, समुदाय आधारित पहल, जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे और अनुभवों के आदान-प्रदान पर सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के सहयोग से 50 से अधिक इंजीनियरिंग छात्रों ने भी सम्मेलन में हिस्सा लिया।

समापन समारोह में जल जीवन मिशन के तहत ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों, ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति के सदस्यों और सुजलम शक्ति समूहों के लिए तैयार आठ क्षमता निर्माण मॉड्यूल जारी किए गए। इनमें संस्थागत जिम्मेदारियों, जल स्रोतों की स्थिरता, जल गुणवत्ता, रखरखाव, तकनीक, सामुदायिक भागीदारी और जलवायु अनुकूलन जैसे विषयों को ग्रामीण परिस्थितियों के उदाहरणों के माध्यम से समझाया गया है।

आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू के दौरान डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, जल गुणवत्ता एवं कम लागत वाली तकनीक और ग्रामीण जल आपूर्ति के शासन एवं कार्यान्वयन ढांचे पर भी सत्र आयोजित किए गए। डिजिटल सत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, भू-स्थानिक तकनीक, एकीकृत डेटा और नागरिक केंद्रित प्लेटफॉर्म के जरिए जल सेवाओं को बेहतर बनाने पर चर्चा हुई। ‘वॉटर ऐज वन डेटा’ की अवधारणा के तहत सुजलम भारत को ग्रामीण पेयजल के लिए डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया।

जल गुणवत्ता से जुड़े सत्र में जल शोधन, पारिस्थितिकी बहाली, वर्षा जल प्रबंधन, भूजल आकलन और जल क्षेत्र में उपकरणों के उपयोग से जुड़ी तकनीकों पर चर्चा हुई। वहीं ग्रामीण जल आपूर्ति शासन सत्र में जल जीवन मिशन के तहत बुनियादी ढांचा तैयार करने से आगे बढ़कर भरोसेमंद, नियमित और टिकाऊ जल सेवाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया।

समापन समारोह में सिंचाई, नदी प्रबंधन और जल गुणवत्ता से संबंधित कई प्रकाशन, रिपोर्ट और प्रोटोकॉल भी जारी किए गए। इनमें प्रमुख एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाओं की पहली जनगणना, सातवीं लघु सिंचाई जनगणना, जल निकायों की दूसरी जनगणना और झरनों की पहली जनगणना की रिपोर्ट शामिल हैं। केंद्रीय जल आयोग के सिंचाई एटलस का भी ई-लोकार्पण किया गया। इसके अलावा प्रदर्शनी की विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कार प्रदान किए गए।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर

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