संस्कृत भारत की अनेक भाषाओं को एक माला में पिरोने वाली स्वर्णिम डोर : उपराष्ट्रपति

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संस्कृत भारत की अनेक भाषाओं को एक माला में पिरोने वाली स्वर्णिम डोर : उपराष्ट्रपति


नई दिल्ली, 06 अक्टूबर (हि.स.)। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने मंगलवार को कहा कि संस्कृत भारत की अनेक भाषाओं को एक भव्य माला में पिरोने वाली स्वर्णिम डोर है। उन्होंने कहा कि देश की प्राचीन ज्ञान परंपरा को संरक्षित, अध्ययन, व्याख्यायित करने के साथ भावी पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाना आवश्यक है।

उपराष्ट्रपति ने यहां श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में संस्कृत के पुनरुत्थान और भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ है। उन्होंने कहा कि संस्कृत की दुर्लभ पांडुलिपियों को संरक्षित कर भावी पीढ़ियों तक पहुंचाया जाना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्कृत विद्यापीठ से केंद्रीय विश्वविद्यालय तक पहुंचने वाली इस संस्था को अब संस्कृत अध्ययन के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में स्थापित होने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने विश्वविद्यालय के ए++ नैक ग्रेड हासिल करने और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न क्षेत्रों में शोध कार्यों की भी सराहना की।

उन्होंने कहा कि भारत की प्रत्येक भाषा ने देश को समृद्ध किया है लेकिन संस्कृत ऐसी स्वर्णिम डोर है जो देश की अनेक भाषाओं के मोतियों को एक भव्य माला में जोड़ती है। उन्होंने परिसर में सुभाषितों के माध्यम से संस्कृत को जीवंत बनाए रखने, 44 वर्षों से ‘विद्यापीठ पंचांग’ के प्रकाशन तथा प्राकृत और वास्तु शास्त्र जैसे शास्त्रीय विषयों के अध्ययन की भी सराहना की।

राधाकृष्णन ने शिक्षकों और विद्यार्थियों से भारत की पांडुलिपि विरासत की खोज, संरक्षण, आलोचनात्मक संपादन और अप्रकाशित संस्कृत पांडुलिपियों के प्रकाशन के लिए काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ‘ज्ञान भारतम मिशन’ के तहत पांडुलिपियों के संरक्षण और दस्तावेजीकरण के लिए 500 करोड़ रुपये के मूल कोष के साथ भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को देश और दुनिया के लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

दीक्षांत समारोह में स्नातक विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने उन्हें आजीवन सीखते रहने और आचार्यों तथा माता-पिता से मिले मूल्यों को आगे बढ़ाने की सलाह दी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में उन्होंने संस्कृत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने का आह्वान किया।

उन्होंने युवाओं से नशे और मादक पदार्थों के सेवन से दूर रहने तथा अनुशासन, खेल, अच्छी संगति और सार्थक गतिविधियों को अपनाने की अपील की। उन्होंने विद्यार्थियों को सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण और सीमित इस्तेमाल करने तथा अपना समय पढ़ने, सीखने, कौशल विकास और वास्तविक रिश्तों को मजबूत करने में लगाने की सलाह दी।

समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति ने ‘अम्नाय कल्पतरु’, ‘विद्यामित्रम्’ और ‘शोध प्रभा’ (जुलाई-सितंबर 2026) सहित तीन प्रकाशनों का विमोचन किया। उन्होंने मेधावी स्नातक विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक भी प्रदान किए और उपस्थित लोगों को ‘नशे को ना’ की शपथ दिलाई। समारोह में केंद्रीय शिक्षा एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक सहित विद्वान, आचार्य, शिक्षक, विद्यार्थी और उनके अभिभावक उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार

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