क्षमा प्रतिशोध के बजाय सुधार और नफरत के बजाय संवाद का मार्ग : उपराष्ट्रपति

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क्षमा प्रतिशोध के बजाय सुधार और नफरत के बजाय संवाद का मार्ग : उपराष्ट्रपति


नई दिल्ली, 04 अक्टूबर (हि.स.)। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भगवान महावीर स्मृति समिति और जैन महासभा के महापर्व क्षमापना समारोह में कहा कि क्षमा प्रतिशोध के बजाय सुधार, नफरत के बजाय संवाद और शत्रुता के बजाय मेल-मिलाप का मार्ग चुनना है। अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा का अभाव नहीं बल्कि विचार, वाणी और कर्म में हिंसा से दूर रहना भी है। वास्तव में विकसित भारत में नागरिकों के बीच विश्वास, परिवारों में संस्कार, युवाओं में चरित्र और समाज में करुणा होनी चाहिए।

उपराष्ट्रपति रविवार को यहां विज्ञान भवन में भगवान महावीर स्मृति समिति और जैन महासभा दिल्ली की ओर से आयोजित महापर्व क्षमापना समारोह-2026 में शामिल हुए। कार्यक्रम में पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया, भगवान महावीर स्मृति समिति के अध्यक्ष कन्हैयालाल जैन, जैन महासभा दिल्ली के अध्यक्ष दिनेश दोशी, आचार्य विशुद्ध सागरजी मुनिराज, श्री जैन तरुण समाज भगवान महावीर स्मृति समिति के महासचिव विपिन जैन, मुनिश्री उदित कुमार जी, मुनिश्री तीर्थ निर्वाण विजय जी और उपाध्याय रविंद्र मुनि जी सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि क्षमापना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि मनुष्य के हृदय में परिवर्तन का अवसर है। जैन परंपरा ने क्षमा को जिस गहराई से आध्यात्मिक साधना में बदला है, वह आज भारत और पूरी मानवता के लिए प्रासंगिक है। जैन धर्म ने तमिल साहित्य और संस्कृति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जैन विद्वानों और साधुओं ने शास्त्रीय तमिल साहित्य के विकास में योगदान दिया। तमिलनाडु में प्राचीन जैन मंदिरों और शिक्षा केंद्रों की मौजूदगी भी इस संबंध को दर्शाती है।

उन्होंने जैन दर्शन के सार्वभौमिक संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी जीवों के प्रति मैत्री और किसी के प्रति शत्रुता नहीं रखने की भावना भारत के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सभ्यतागत विचार से जुड़ी है। संघर्ष और हिंसा से जूझ रही दुनिया में भगवान महावीर की शिक्षाएं शांति, संवाद, सह-अस्तित्व और करुणा का मार्ग दिखाती हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भगवान महावीर ने मानवता को आंतरिक विजय का मार्ग दिखाया। वास्तविक शक्ति क्रोध, असहिष्णुता और प्रतिशोध पर विजय पाने में है। अहिंसा को केवल शारीरिक हिंसा से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। विचार, वाणी और कर्म में हिंसा से मुक्त होना भी अहिंसा का हिस्सा है।

उन्होंने कहा कि क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना या सत्य से समझौता करना नहीं है। क्षमा का अर्थ प्रतिशोध के बजाय सुधार, नफरत के बजाय संवाद और शत्रुता के बजाय मेल-मिलाप का रास्ता चुनना है। प्रतिक्रमण की भावना व्यक्ति और परिवारों को अपनी गलतियों को स्वीकार करने तथा विवादों के समाधान में मदद कर सकती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर

Livevns.news Desk
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