मूल्य संवर्धन और आधुनिक तकनीक से बढ़ेगी देश के मछुआरों की आय
नई दिल्ली, 30 अक्टूबर (हि.स.)। मूल्य संवर्धन और आधुनिक तकनीक से न केवल देश के मछुआरों की आय बढ़ेगी अपितु उत्पादन से बाजार तक बदलेगा और मत्स्य क्षेत्र का स्वरूप भी बदलेगा। यानी भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र अब पारंपरिक मछली उत्पादन की सीमाओं से आगे बढ़कर बाजारोन्मुख उद्यमिता के नए दौर में प्रवेश कर रहा है।
खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाने, मछुआरों और मत्स्य पालकों की आय में वृद्धि करने तथा समुद्री खाद्य उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहित करने में यह क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सरकार की विभिन्न योजनाओं, बुनियादी ढांचे में निवेश और तकनीकी नवाचारों के परिणामस्वरूप मत्स्य क्षेत्र की पूरी मूल्य शृंखला में बदलाव देखने को मिल रहा है।
मत्स्य विभाग ने शुक्रवार को एक बयान में कहा कि मछली उत्पादन के साथ-साथ अब उसके प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, भंडारण और विपणन पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। रेडी-टू-कुक और रेडी-टू-ईट मत्स्य उत्पादों की बढ़ती मांग ने मूल्य संवर्धन आधारित कारोबार के लिए नए अवसर खोले हैं। इससे उत्पादकों को बेहतर बाजार और उचित मूल्य मिलने की संभावनाएं बढ़ रही हैं। साथ ही उत्पादों की गुणवत्ता, भंडारण अवधि और बाजार तक पहुंच में सुधार होने से फसलोत्तर नुकसान को कम करने में भी मदद मिल रही है।
मत्स्य क्षेत्र के विकास को गति देने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2015 से सार्वजनिक निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की है। नीली क्रांति योजना, मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि (एफआईडीएफ), प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई), प्रधानमंत्री मत्स्य समृद्धि सह-योजना (पीएम-एमकेएसएसवाई) और किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) जैसी योजनाओं के माध्यम से कुल 39,272 करोड़ रुपये की राशि प्रतिबद्ध की गई है।
इन योजनाओं का उद्देश्य मछली उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ आधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास, फसलोत्तर प्रबंधन को मजबूत करना और रोजगार के नए अवसर पैदा करना है। इन पहलों से देशभर के 74.66 लाख मछुआरों और मत्स्य पालकों की आजीविका को सहारा मिल रहा है।
मत्स्य उत्पादों को सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण तरीके से बाजार तक पहुंचाने के लिए परिवहन और लॉजिस्टिक्स सुविधाओं के विस्तार पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसके तहत 3,393.85 करोड़ रुपये के निवेश से मछली परिवहन प्रणालियों, थोक एवं खुदरा बाजारों, फिश कियोस्क, फीड मिल, आइस प्लांट, कोल्ड स्टोरेज और मूल्य संवर्धित उद्यम इकाइयों सहित 46,500 सुविधाओं का विकास किया गया है।
इसके अलावा पांच आधुनिक एवं स्मार्ट मछली बाजार विकसित किए जा रहे हैं। इनमें उन्नत सूचना प्रौद्योगिकी, हरित तकनीक और आधुनिक लॉजिस्टिक्स प्रणालियों को एकीकृत किया जा रहा है। इन बाजारों से लगभग 15,900 रोजगार के अवसर सृजित होने की उम्मीद है। बेहतर कोल्ड चेन व्यवस्था से मछली की गुणवत्ता बनाए रखने, खराब होने की आशंका कम करने और उत्पादकों को बड़े बाजारों से जोड़ने में मदद मिलेगी।
मत्स्य पालन क्षेत्र में तकनीकी नवाचार भी तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं। उद्यमों और मत्स्य पालकों द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), ब्लॉकचेन, ड्रोन और स्मार्ट कोल्ड चेन जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ाया जा रहा है।
इन तकनीकों की मदद से मछली पालन में पानी की गुणवत्ता की निगरानी, उत्पादन प्रबंधन, रोगों की पहचान, उत्पादों की ट्रेसबिलिटी और आपूर्ति शृंखला की निगरानी को बेहतर बनाया जा रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल आधारित विपणन से उत्पादकों को सीधे ग्राहकों और बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिल रहा है। इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और उत्पादों का बेहतर मूल्य प्राप्त करने की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं।
मूल्य संवर्धन आधारित उद्योगों के विस्तार के लिए गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की नियमित उपलब्धता आवश्यक है। इसे ध्यान में रखते हुए मछलियों की आनुवंशिक गुणवत्ता में सुधार के लिए पहल की जा रही हैं। इनका उद्देश्य तेजी से बढ़ने वाली, रोग प्रतिरोधक क्षमता से युक्त और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बेहतर उत्पादकता वाली प्रजातियों का विकास करना है।
इस पहल के तहत ट्राउट, झींगा, कतला, रोहू, तिलापिया, पंगासियस, सीबास और स्कैम्पी जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर है। बेहतर नस्लों से घरेलू बाजार, प्रसंस्करण उद्योग और निर्यात क्षेत्र के लिए गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है। इससे मत्स्य पालकों की उत्पादकता और लाभप्रदता में सुधार के साथ मूल्य संवर्धन आधारित उद्योगों को भी मजबूती मिलेगी।
छोटे मछुआरों और मत्स्य पालकों को संगठित कर उन्हें बड़े बाजारों से जोड़ने के लिए सामूहिक उद्यम मॉडल को प्रोत्साहित किया जा रहा है। विभाग की ओर से अब तक 2,195 मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों (एफएफपीओ) के गठन में सहयोग दिया गया है।
इन संगठनों के माध्यम से छोटे उत्पादक अपने उत्पादन को एकत्रित कर सकते हैं, संसाधनों का साझा उपयोग कर सकते हैं और प्रसंस्करण, ब्रांडिंग तथा विपणन जैसी गतिविधियों में सामूहिक रूप से भाग ले सकते हैं। कई एफएफपीओ को ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) से भी जोड़ा गया है, जिससे उनके लिए डिजिटल बाजारों तक पहुंच के नए रास्ते खुले हैं।
वहीं, पीएम-एमकेएसएसवाई के तहत एनसीडीसी, नेफेड, एसएफएसी और एनईआरएएमएसी जैसी मध्यस्थ एजेंसियों के सहयोग से 5,500 मत्स्य सहकारी समितियों को एफएफपीओ के रूप में कार्य करने के लिए मजबूत किया जा रहा है। इससे छोटे उत्पादकों की सामूहिक सौदेबाजी क्षमता बढ़ाने और उन्हें आधुनिक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ने में मदद मिलेगी।
मत्स्य क्षेत्र में मूल्य संवर्धन ने महिलाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। विशेष रूप से मछली सुखाने, अचार, पापड़, स्मोक्ड फिश, मछली पाउडर, पैकेजिंग और खुदरा बिक्री जैसे कार्यों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत पिछले पांच वर्षों में 1.28 लाख से अधिक महिला लाभार्थियों के हित में 4,155 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 1,572 करोड़ रुपये है।
मोबाइल फिश वेंडिंग इकाइयों और छोटे प्रसंस्करण उद्यमों के माध्यम से तटीय, अंतर्देशीय और पूर्वोत्तर राज्यों की महिलाओं को आजीविका के नए अवसर मिल रहे हैं। इससे न केवल उनकी आर्थिक भागीदारी मजबूत हो रही है, बल्कि किफायती और प्रोटीन से भरपूर मत्स्य उत्पादों की उपलब्धता बढ़ने से पोषण सुरक्षा को भी समर्थन मिल रहा है।
भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र अब उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रसंस्करण, कोल्ड चेन, आधुनिक परिवहन, डिजिटल विपणन, तकनीकी नवाचार और उद्यमिता में निवेश इस बदलाव के प्रमुख आधार बन रहे हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / रामानुज शर्मा

