पिछोर का 2.5 अरब वर्ष पुराना ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट बना अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक महत्व का केंद्र, नए वैज्ञानिक अध्ययन ने किया प्रमाणित

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वाराणसी, 15 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले स्थित पिछोर का दुर्लभ ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक महत्व का केंद्र बन गया है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने इस अनूठी चट्टान संरचना को भारत का “राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल” घोषित किया है, जबकि एक नए अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययन ने इसकी प्राचीनता और भूवैज्ञानिक महत्व को प्रमाणित किया है।

बीएचयू के जनसंपर्क कार्यालय ने शुक्रवार को बताया कि 16 अक्टूबर 2025 को 4वें यूनेस्को अंतरराष्ट्रीय भू-विविधता दिवस तथा 9वें अंतरराष्ट्रीय भू-नैतिकता दिवस के अवसर पर जीएसआई के महानिदेशक असीत साहा ने पिछोर ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट को संरक्षित भू-विरासत स्थल घोषित करने संबंधी औपचारिक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। यह घोषणा श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) स्थित गुर्युल रवीन पर्मियन-ट्राइसिक सीमा खंड के साथ की गई थी।

इसी बीच, वर्ष 2025 में प्रकाशित अध्ययन यू-पी.बी. ज़िरकॉन एज एंड जियोकेमिस्ट्री ऑफ़ पिछोर ऑर्बिचल ग्रेनिटॉइड, बुंदेलखंड क्रैटोन, भारत (साइंसडायरेक्ट, 2025) ने पहली बार रेडियोमेट्रिक डेटिंग और समस्थानिक विश्लेषण के आधार पर यह स्थापित किया है कि पिछोर की यह चट्टान संरचना लगभग 2.5 अरब वर्ष पुरानी है। अध्ययन के अनुसार यह संरचना बुंदेलखंड क्रैटोन के नियोआर्कियन मैग्माटिक इतिहास से जुड़ी हुई है।

इस शोध का नेतृत्व काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के प्रदीप कुमार सिंह ने किया। इस अध्ययन में ब्राजील की यूएनआईसीएएमपी के एलसन पी. ओलिवेरा, आईआईटी कानपुर के देबाज्योति पॉल सहित कई भारतीय और विदेशी वैज्ञानिक शामिल रहे। यह शोध भारत-ब्राजील वैज्ञानिक सहयोग के तहत हुआ, जो इस स्थल के अंतरराष्ट्रीय महत्व को रेखांकित करता है।

दरअसल, पिछोर की यह चट्टान संरचना अपनी लगभग पूर्ण गोलाकार खनिजीय परतों वाले “ऑर्बिकल्स” के लिए जानी जाती है, जो एप्लिटिक ग्रेनाइट मैट्रिक्स के भीतर विकसित हुए हैं। इस प्रकार के ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट विश्व में अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं और दुनियाभर में इनके कुछ सौ उदाहरण ही ज्ञात हैं। नए अध्ययन में इन संरचनाओं की उत्पत्ति को विशुद्ध अग्निज और फेल्सिक प्रकृति का बताया गया है, जो क्वार्ट्ज-मोनज़ोनाइट मैग्मा से निर्मित हुईं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह स्थल न केवल एक भूवैज्ञानिक विस्मय है, बल्कि पृथ्वी के प्राचीन भू-पटल विकास का जीवंत अभिलेख भी है। जीएसआई की घोषणा के बाद इस क्षेत्र को औपचारिक संरक्षण और प्रबंधन का दर्जा मिलेगा। साथ ही मध्य भारत में भू-पर्यटन, भू-विज्ञान शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान को भी नई दिशा मिलने की संभावना है।

विशेषज्ञों के अनुसार, विश्व में ज्ञात ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट घटनाओं का लगभग एक-तिहाई हिस्सा फिनलैंड में पाया जाता है, जबकि दक्षिण एशिया में पिछोर को सबसे महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक रूप से आकर्षक स्थलों में गिना जा रहा है। उल्लेखनीय है कि भूवैज्ञानिक साहित्य में इस स्थल को एक संभावित भू-ऐतिहासिक धरोहर के रूप में एक दशक से अधिक समय पहले ही चिन्हित किया जा चुका था।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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