जनसांख्यिकी तय करेगी विकसित भारत की दिशा, अखंड भारत की चेतना बनेगी आधार : रविन्द्र सिंघवी

WhatsApp Channel Join Now
जनसांख्यिकी तय करेगी विकसित भारत की दिशा, अखंड भारत की चेतना बनेगी आधार : रविन्द्र सिंघवी


- अखंड भारत की ऐतिहासिक स्मृति और विकसित भारत के भविष्य पर रविन्द्र सिंघवी ने बनाई लघु फिल्म

- जनसांख्यिकी, जनगणना, विवाह, सामाजिक संरचना, विभाजन और नागरिकता जैसे मुद्दों पर विमर्श

- 1947 के विभाजन और विस्थापन की स्मृतियों से लेकर वर्तमान जनसांख्यिकीय बदलाव तक की चर्चा

- पूरी पीढ़ी केवल व्यक्तिगत आकांक्षाओं तक सीमित हो जाए तो समाज की अगली पीढ़ी कौन तैयार करेगा

- जनसांख्यिकीय बदलावों को समझना राष्ट्रीय संप्रभुता और सामाजिक स्थिरता के लिए जरूरी

- आने वाली पीढ़ी को कैसा भारत सौंपना चाहते हैं, इस पर नागरिक विमर्श महत्वपूर्ण

लखनऊ, 09 अक्टूबर (हि.स.)। राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता, उसकी शक्ति जनसंख्या, संस्कृति, परिवार, अर्थव्यवस्था, सामाजिक चेतना और आने वाली पीढ़ियों में भी निहित होती है। अखंड भारत की ऐतिहासिक स्मृति से विकसित भारत के भविष्य तक की यात्रा केवल भूगोल का विषय नहीं, बल्कि बदलती जनसांख्यिकी, विभाजन की स्मृतियों, सांस्कृतिक निरंतरता और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़े विमर्श का भी हिस्सा है। इसी व्यापक संदर्भ में फिल्म निर्माता रविन्द्र सिंघवी ने एक लघु फिल्म बनाई है। फिल्म में जनसंख्या, जनगणना, विवाह, सामाजिक संरचना, विभाजन, प्रवासन, नागरिकता और राष्ट्रीय संप्रभुता जैसे विषयों पर विमर्श किया गया है।

विभाजन की स्मृतियों से जनसांख्यिकी और नागरिकता तक

1881 से 2011 तक की जनगणनाओं के संदर्भ में फिल्म निर्माता रविन्द्र सिंघवी ने भारत की बदलती जनसांख्यिकीय तस्वीर पर सवाल उठाए हैं। फिल्म में 1941 के विभाजन-पूर्व आंकड़ों, 1951 के स्वतंत्र भारत और 2011 की आखिरी पूर्ण जनगणना के संदर्भ में जनसंख्या में आए बदलावों को समझने का प्रयास किया गया है। सिंघवी के अनुसार, जनसंख्या के अनुपात में परिवर्तन को केवल आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों पर भी विमर्श होना चाहिए। सिंघवी ने कहा कि जनसंख्या का प्रश्न परिवार और विवाह से भी जुड़ा है। भारतीय परंपरा में विवाह को सामाजिक निरंतरता और पारिवारिक उत्तरदायित्व से जोड़ा गया है। हालांकि आधुनिक भारत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिलाओं की शिक्षा, करियर, आर्थिक आत्मनिर्भरता और मातृत्व के अधिकार को भी समान महत्व दिया जाना जरूरी है। विवाह या मातृत्व किसी व्यक्ति पर थोपा नहीं जा सकता, लेकिन समाज की अगली पीढ़ी और मानव संसाधन निर्माण को लेकर भी विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बड़ी युवा आबादी शिक्षित, कुशल और रोजगारयुक्त हो तो वह भारत की आर्थिक शक्ति बन सकती है। वहीं शिक्षा, रोजगार और संसाधनों की कमी होने पर यही जनसंख्या चुनौती का रूप ले सकती है। इसलिए जनसंख्या नीति को केवल जन्मदर की चर्चा तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसे मानव संसाधन निर्माण से भी जोड़कर देखना होगा। फिल्म में भारत-विभाजन को जनसांख्यिकी और राजनीति के ऐतिहासिक संबंध के संदर्भ में भी रखा गया है। 1947 का भारत-विभाजन, पाकिस्तान का गठन, 1971 में बांग्लादेश का निर्माण और विस्थापित परिवारों की पीड़ा भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण स्मृतियों का हिस्सा हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अन्य क्षेत्रों से भारत आए लोगों की नागरिकता और पहचान का प्रश्न भी इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। इसी संदर्भ में नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 को भी फिल्म में चर्चा के विषय के रूप में रखा गया है।

परिवार और विवाह से जुड़ी है सामाजिक-सांस्कृतिक निरंतरता

सिंघवी ने 'हिन्दुस्थान समाचार' से बातचीत में कहा कि जनसांख्यिकी और लोकतंत्र का संबंध महत्वपूर्ण है। जनसंख्या का स्वरूप चुनावी प्रतिनिधित्व और राजनीतिक प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है, जबकि सरकारी नीतियां जन्मदर, प्रवासन, नागरिकता और सामाजिक संरचना पर प्रभाव डाल सकती हैं। उन्होंने कहा कि अवैध प्रवासन, सीमा सुरक्षा और स्थानीय संसाधनों पर दबाव जैसे विषयों पर भावनात्मक आरोपों के बजाय प्रमाणित आंकड़ों, कानून और प्रशासनिक तथ्यों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए।

संप्रभुता के साथ सांस्कृतिक पहचान भी राष्ट्र की शक्ति

सिंघवी ने कहा कि भारत के अलावा यूरोप और अमेरिका सहित कई देशों में कम जन्मदर, वृद्ध होती आबादी, प्रवासन और सांस्कृतिक एकीकरण को लेकर बहस चल रही है। ऐसे में भारत के सामने भी यह प्रश्न है कि आधुनिकता और परंपरा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक निरंतरता तथा वैश्विक संपर्क और राष्ट्रीय हित के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। उन्होंने कहा कि संप्रभुता का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है। सांस्कृतिक पहचान, जनसांख्यिकीय स्थिरता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक एकता और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती भी आधुनिक राष्ट्र की शक्ति का हिस्सा हैं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में संप्रभुता के साथ न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्शों तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता का उल्लेख है। इसी संदर्भ में फिल्म में अखंड भारत की ऐतिहासिक स्मृति से विकसित भारत के आधुनिक लक्ष्य तक की यात्रा को राष्ट्रीय चेतना से जोड़कर देखने का प्रयास किया गया है।

लोकतंत्र की दिशा को भी प्रभावित करता है जनसंख्या का गणित

रविन्द्र सिंघवी ने कहा कि विकसित भारत केवल सड़कों, उद्योगों, तकनीक और अर्थव्यवस्था से नहीं बनेगा। इसके लिए शिक्षित और कुशल नागरिक, सशक्त महिलाएं, स्वस्थ परिवार, वैज्ञानिक दृष्टि, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सुरक्षित सीमाएं, आर्थिक शक्ति और संविधान के प्रति प्रतिबद्ध नागरिक चेतना भी आवश्यक होगी। उन्होंने कहा कि सवाल केवल यह नहीं है कि जनसंख्या कितनी है, बल्कि यह भी है कि देश अपनी जनसंख्या को किस प्रकार मानवशक्ति में बदलता है। परंपरा और आधुनिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन, अतीत से सीख और भविष्य की आवश्यकताओं को समझना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि अतीत से चेतना, आंकड़ों से समझ, वर्तमान से जिम्मेदारी और भविष्य के प्रति संकल्प के आधार पर अखंड भारत की ऐतिहासिक स्मृति से विकसित भारत के आधुनिक स्वप्न को आकार दिया जा सकता है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ .राजेश

Share this story