सनातनी तनातनी : स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद से उठे अंतर्द्वद के सवाल
- आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण बोले, आक्रोश की आग में न जले सनातन
प्रयागराज, 22 जनवरी (हि.स.)। प्रयागराज से उठा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद अब एक घटनाभर नहीं रहा, बल्कि उसने सनातन धर्म के भीतर चल रहे वैचारिक मंथन को सतह पर ला दिया है। सोशल मीडिया फेसबुक पर पोस्ट करते हुए श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या के हनुमत निवास (हनुमंत पीठ) के पीठाधीश्वर (महंत) आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि माघ मेला क्षेत्र में घटी घटना के बाद जिस तरह से संत, साधु, राजनेता, बुद्धिजीवी और सोशल मीडिया दो खेमों में बंटते दिखाई दिए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि आज सनातन बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक द्वंद्व से जूझ रहा है।
विवाद की जड़ : आस्था बनाम व्यवस्था
आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला-प्रशासन के नियमों के उल्लंघन और उसके बाद पुलिस से टकराव को उनके समर्थक धर्म और आस्था पर आघात बता रहे हैं। जबकि प्रशासन और आलोचक इसे कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा का प्रश्न मानते हैं। यही बिंदु सनातनी तनातनी की जड़ है। उन्हाेंने ने कहा कि क्या धर्म नियमों से ऊपर है? या फिर धर्म का पालन स्वयं मर्यादा और व्यवस्था से होकर गुजरता है? सनातन परंपरा का इतिहास बताता है कि धर्म और अनुशासन कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे, किंतु वर्तमान विवाद में यही संतुलन टूटता हुआ प्रतीत हो रहा है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और आक्रामक संत-राजनीति
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर एक बड़ा वर्ग मानता है कि वे गोरक्षा, धर्मरक्षा और सनातन अस्मिता के मुखर प्रहरी हैं। वहीं दूसरा वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि क्या संत को सत्ता से सीधी टकराहट करनी चाहिए? क्या राजनीतिक भाषा और आरोप-प्रत्यारोप संत-परंपरा के अनुरूप हैं? क्या व्यक्तिगत आक्रोश को सनातन धर्म का स्वरूप दिया जा सकता है? उनकी वाणी में बढ़ती तीक्ष्णता, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर की गई टिप्पणियां, और संवैधानिक पदों को लेकर दिए गए वक्तव्यों ने इस विवाद को और गहरा कर दिया है। आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि इससे सनातन धर्म की गंभीर, संतुलित और करुणामय छवि को क्षति पहुंचती है।
संत-समाज का मौन और संदेश
पुरी, शृंगेरी और द्वारका पीठ जैसे प्रमुख शंकराचार्य पीठों की इस पूरे प्रकरण पर संयमित चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। यह मौन इस बात का संकेत माना जा रहा है कि राष्ट्र केवल धर्म से नहीं, संविधान से चलता है और संत को दोनों के बीच संतुलन साधना होता है। यह मौन दरअसल सनातन की उस परंपरा की याद दिलाता है, जिसमें शास्त्रार्थ होता था, शोर नहीं।
सोशल मीडिया : धर्म का मंच या रणभूमि?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद ने सोशल मीडिया को एक बार फिर डिजिटल धर्मयुद्ध का मैदान बना दिया। व्यूज और रीच की होड़ में कुछ स्वयंभू सनातनी योद्धा पुलिस को संपूर्ण ब्राह्मण-विरोधी बताने लगे। घटना को सनातन पर हमले के रूप में प्रस्तुत करने लगे और असहमति को धर्मद्रोह घोषित करने लगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उन्माद सनातन धर्म को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर करता है, क्योंकि इससे संवाद के स्थान पर विभाजन जन्म लेता है।
सनातन धर्म के सामने असली चुनौती
इस पूरे विवाद ने एक कठोर सत्य उजागर किया है कि सनातन धर्म को आज सबसे बड़ा खतरा बाहरी आलोचकों से नहीं, आंतरिक असंयम से है। यदि हर प्रशासनिक टकराव को धर्मयुद्ध, हर नियम को अपमान और हर असहमति को विरोधी घोषित किया जाएगा तो इससे धर्म की मर्यादा घटेगी। संत-समाज की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठेंगे और सनातन का स्वरूप उग्र राजनीति में सिमट जाएगा।
सनातन को दहाड़ नहीं, दिशा चाहिए
आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सनातन परंपरा के प्रतिनिधि हैं। उनसे अपेक्षा है कि वे संवाद, संयम और दूरदृष्टि का मार्ग प्रशस्त करें। वहीं शासन-प्रशासन को भी संत-समाज के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान बनाए रखना होगा। सनातन धर्म का इतिहास बताता है कि उसने करुणा, तप और साधना से स्वयं को जीवित रखा है। आज आवश्यकता है कि सनातनी तनातनी नहीं, सनातनी संतुलन को अपनाया जाए, क्योंकि धर्म जब धैर्य खो देता है तब उसका सबसे बड़ा नुकसान धर्म को ही होता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश

