उत्तराखंड में मंडरा रहा ‘जलबम’ का खतरा, 13 हिमालयी झीलें बेहद संवेदनशील
नई दिल्ली, 31 अगस्त (हि.स.)। नेपाल में आई जल त्रासदी उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों के लिए भी बड़े खतरे का संकेत है। यहां ऐसे कई ‘जलबम’ मौजूद हैं, जो कभी भी फट सकते हैं। इससे राज्य के कई जिलों में बड़ी तबाही आ सकती है। हालांकि सरकार इन पर नजर रखे हुए है और जरूरी कदम उठा रही है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने अपनी एक रिपोर्ट में राज्य के हिमालयी क्षेत्रों में संवेदनशील और अत्यधिक जोखिम वाली 13 झीलों को खतरनाक बताया है। रिपोर्ट में राज्य में लगातार पहाड़ों पर सुरंगें, सड़कें और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए अनियोजित खनन और भारी निर्माण गतिविधियों पर चिंता जताई गई है और भविष्य में आपदाओं को कम करने के लिए कई सिफारिशें भी की हैं। संस्थान ने माना कि तमाम गतिविधियों ने हिमालयी क्षेत्र को गंभीर रूप से कमजोर किया है।
राज्य के हिमालयी क्षेत्रों में झीलों के रूप में बनें जलबमों के संबंध में प्राकृतिक आपदाओं के संभावित खतरों को लेकर एनडीएमए और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने फरवरी 2024 की अपनी संयुक्त रिपोर्ट में सरकारों को सचेत कर चुकी है।
एनडीएमए और वाडिया संस्थान की रिपोर्टों और अध्ययनों के अनुसार, उत्तराखंड में 13 अति-संवेदनशील ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं। इनमें से पांच झीलें, चमोली जिले का वसुधारा ताल, जोशीमठ क्षेत्र में अत्यधिक जोखिम वाली नामविहीन झील, पिथौरागढ़ जिले में दारमा और कुटियांगली चोटियों की घाटी में सयांत्यांकती झील, इसी जिले के लासरयांगती घाटी के पास माबोंग झील और चीन सीमा से सटे संवेदनशील ग्लेशियर क्षेत्र में प्युंगरू झील को सबसे खतरनाक श्रेणी में रखा गया है। इसके अलावा चमोली जिले में सरस्वती ताल और उत्तरकाशी जिले में केदारताल को भी अत्यधिक जोखिम वाला माना गया है।
रिपोर्ट के अनुसार यदि किन्हीं कारणों से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कोई बड़ी ग्लेशियर झील फटती है तो इन नदियों के किनारों पर बसे शहर, कस्बा और गांवों में तबाही मच सकती है। इसके अलावा राज्य के आधारभूत संरचना को भी काफी नुकसान हो सकता है। चमोली जिला और अलकनंदा घाटी जोशीमठ, तपोवन और रैणी धौलीगंगा तथा ऋषिकेश में (ऋषि गंगा) नदियों में अचानक बाढ़ आने से जोशीमठ का तपोवन क्षेत्र और आसपास के गांव, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और चमोली शहर में नुकसान होगा। अलकनंदा नदी का जलस्तर बढ़ने पर इन मुख्य नगरों और निचले इलाकों में भारी तबाही और तटीय कटाव हो सकता है। इसी तरह केदारताल या गंगोत्री ग्लेशियर के पास स्थित झीलों के टूटने से भागीरथी नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर उत्तरकाशी शहर पर पड़ता है। भागीरथी नदी के किनारे बसे हर्षिल, झाला और मनेरी इलाके अत्यधिक संवेदनशील हैं।
एनडीएमए और जल विज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार, ऋषिकेश और हरिद्वार के निचले और तटीय इलाके जलमग्न हो सकते हैं। ऋषिकेश में नदी के बिल्कुल किनारे बसे क्षेत्र जैसे त्रिवेणी घाट, नाव घाट, चंद्रभागा नदी का तटीय इलाका और लक्ष्मण झूला व राम झूला के निचले बाजारों के अलावा तटीय रिसॉर्ट्स और आश्रम जलमग्न हो सकते हैं। हरिद्वार में गंगा का जलस्तर अचानक बढ़ने से हर की पौड़ी, कांगड़ा घाट और चंडी घाट के निचले हिस्से पूरी तरह डूब सकते हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी घाटों और होटलों में कई फुट मोटी कीचड़ की परत जमा हो जाएगी, जिसे साफ करने में महीनों लग सकते हैं। इससे न केवल बड़े पैमाने पर जनहानि होगी, बल्कि राज्य में आधारभूत संरचना, जलविद्युत परियोजनाओं को भी काफी नुकसान हो सकता है।
एनडीएमए ने संवेदनशील ग्लेशियर झीलों और नदियों पर वास्तविक समय में निगरानी करने के लिए स्वचालित मौसम स्टेशन और सेंसर स्थापित करने, संवेदनशील पहाड़ी शहरों और पर्यटन स्थलों (जैसे चारधाम मार्ग) की वहन क्षमता तय करने और भूकंपीय और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में भारी अवसंरचनात्मक निर्माण पर पूर्ण रोक या कड़े नियंत्रण लागू करने की सिफारिश की है।
राज्य सरकार इस रिपोर्ट की सिफारिशों पर मंथन कर रही है। नेपाल त्रासदी से सबक लेते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 27 अगस्त को उत्तराखंड की संवेदनशील ग्लेशियर झीलों से होने वाले संभावित खतरों को लेकर एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की थी। बैठक में मुख्यमंत्री धामी ने सरस्वती ताल (चमोली) और केदारताल (उत्तरकाशी) के विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञ टीमों को तुरंत रवाना करने, संवेदनशील झीलों पर अत्याधुनिक वाटर-लेवल सेंसर, ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, सैटेलाइट आधारित सायरन सिस्टम लगाने और झीलों के पानी को सुरक्षित तरीके से निकालकर दबाव कम करने के निर्देश दिए हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / वीरेन्द्र सिंह

