उत्तराखंड-थाईलैंड के बीच संस्कृत, शिक्षा और रामायण परंपरा में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा

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उत्तराखंड-थाईलैंड के बीच संस्कृत, शिक्षा और रामायण परंपरा में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा


देहरादून, 11 अगस्त (हि.स.)। उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में ‘13 जनपद-13 संस्कृत ग्राम’ पहल के एक वर्ष पूरे होने के अवसर पर संस्कृत शिक्षा, जनगणना एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन सचिव दीपक कुमार ने नई दिल्ली स्थित रॉयल थाई एम्बेसी में भारत में थाईलैंड की राजदूत चावनार्ट थांगसुम्फंत से मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों के बीच संस्कृत, शिक्षा और रामायण परंपरा व सांस्कृतिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।

कुमार ने थाई राजदूत को उत्तराखंड में संस्कृत ग्रामों की स्थापना की पहल और इसके एक वर्ष पूरे होने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य संस्कृत को केवल शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय जनजीवन से जोड़ना और इसे घर-घर तक पहुंचाना है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन में उत्तराखंड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। राज्य वर्ष 2010 में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने वाला देश का पहला राज्य बना था। कुमार ने संस्कृत विद्वान आचार्य दिनेश चंद्र जोशी की जन्मशती के अवसर पर देशभर में आयोजित कार्यक्रमों की जानकारी भी थाई राजदूत को दी।

बैठक में भारत और थाईलैंड के बीच साझा सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत संबंधों पर चर्चा करते हुए रामायण परंपरा को दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग का महत्वपूर्ण माध्यम बनाने का सुझाव दिया गया। सचिव ने थाईलैंड की पारंपरिक रामायण प्रस्तुतियों और उत्तराखंड की रामलीला परंपरा के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की संभावनाओं पर चर्चा की।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी भाषाओं में रामलीला का मंचन किया जाता है। थाईलैंड की रामायण प्रस्तुति परंपरा और उत्तराखंड की स्थानीय रामलीला परंपराओं को साझा मंच उपलब्ध कराया जा सकता है, जिससे दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक विरासत को व्यापक स्तर पर प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा।

कुमार ने औपचारिक समझौता ज्ञापन से पहले उत्तराखंड के संस्कृत संस्थानों और थाईलैंड के विश्वविद्यालयों में संस्कृत के अध्यापकों एवं विद्वानों के बीच ऑनलाइन शैक्षणिक संवाद शुरू करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने थाईलैंड में संस्कृत, पालि और भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन-अध्यापन से जुड़े संस्थानों में संयुक्त शैक्षणिक कार्यक्रमों और पाठ्यक्रमों की संभावनाओं का अध्ययन करने की बात कही।

उन्होंने सुझाव दिया कि थाई रामायण प्रस्तुतियों से जुड़े कलाकारों और सांस्कृतिक दल को उत्तराखंड के संस्कृत ग्रामों का भ्रमण कराया जा सकता है। इसके अलावा उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय और उत्तराखंड संस्कृत संस्थानम् के सहयोग से हरिद्वार में थाई रामायण की विशेष सांस्कृतिक प्रस्तुति आयोजित करने की संभावना पर भी चर्चा की गई।

थाई राजदूत और डिप्टी चीफ ऑफ मिशन किरण मूंगटिन ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए उत्तराखंड सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। उन्होंने उत्तराखंड और थाईलैंड के बीच संस्कृत, शिक्षा और सांस्कृतिक क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं को आगे बढ़ाने में सहयोग का आश्वासन दिया।

बता दें कि थाईलैंड का संस्कृत अध्ययन और संस्कृत विद्या से लंबे समय से गहरा संबंध रहा है। थाई राजपरिवार की राजकुमारी महा चक्री सिरिंधोर्न संस्कृत की प्रतिष्ठित विदुषी हैं और उन्हें भारत की ओर से विश्व संस्कृत पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। संस्कृत के अध्ययन और संवर्धन में उनके योगदान को महत्वपूर्ण माना जाता है। थाईलैंड ने 28 जून से दो जुलाई 2015 तक बैंकॉक में 16वें विश्व संस्कृत सम्मेलन की मेजबानी की थी, जिससे वैश्विक स्तर पर संस्कृत अध्ययन के क्षेत्र में उसकी सक्रिय भूमिका रेखांकित हुई।

थाईलैंड के संस्कृत विद्वानों के योगदान को भारत में भी सम्मान मिला है। प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान प्रोफेसर चिरापत प्रपंडविद्या को संस्कृत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए वर्ष 2022 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अलावा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से थाईलैंड में संस्कृत के लिए एक चेयर स्थापित की गई है। इससे दोनों देशों के बीच संस्कृत अध्ययन, शैक्षणिक सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के प्रयासों को मजबूती मिली है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय

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