सावन आते ही लौट आती हैं ये परंपराएं, जानें वो मान्यताएं जिन्हें आज भी लोग शौक से निभाते हैं
सावन इस साल 30 जुलाई से शुरू हो रहा है। इस महीने को भक्ति, हरियाली, सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पहले गांवों में इस समय जगह-जगह पर झूलें लगाएं और लोकगीत गाए जाते थे। हालांकि, बदलते समय के साथ पुरानी ये परंपराएं अब गुम सी होती जा रही हैं। आज हम इस लेख में आपको उन पुरानी परंपराओं और मान्यताओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जो इस महीने की जान हैं।

सावन के झूले और कजरी के गीत
पुराने समय में गांव और कस्बें में लड़कियां और महिलाएं एक साथ एकत्र होकर झूला झूलती थीं और कजरी गाया करती थीं। सावन आते ही बाग-बगीचों और घरों के आंगनों में पेड़ों की मजबूत डालियों पर झूले डाल दिए जाते हैं। हालांकि, पहले के मुकाबले अब ये परंपराएं कुछ ही जगहों पर देखने को मिलती हैं। मगर जो बात बड़े पेड़ों पर लगे लकड़ी के पटरे वाले झूले और पोंग मारने में हुआ करता था वह गायब सा हो गया है।

हाथों में हरी चूड़ियां और मेहंदी
सावन में चारों तरफ हरी-भरी हो जाती है। इस हरे रंग को समृद्धि, सौभाग्य और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि सावन के महीने में सुहागिन महिलाएं और लड़कियां हाथों में हरी चूड़ियां पहनती हैं और मेहंदी लगाती हैं।
घेवर बनाने की परंपरा
सावन के महीने का जायका घेवर के बिना अधूरा माना जाता है। उत्तर भारत में सावन के दौरान ही घेवर बनाया और खाया जाता है। इस महीने में सावन की तीज पर नवविवाहित बेटियों के ससुराल में मायके से घेवर, कपड़े, चूड़ियां और शृंगार का सामान भेजने की सदियों पुरानी परंपरा है। यह रिवाज रिश्तों को मजबूत करने और बेटी के प्रति प्यार जाहिर करने का एक सुंदर तरीका है।

हरे कपड़े और सुहाग के त्योहार
सावन में पड़ने वाली हरियाली तीज और नाग पंचमी जैसे त्योहारों पर महिलाएं विशेष रूप से हरे रंग की साड़ियां या पारंपरिक परिधान पहनती हैं। इस दिन महिलाएं माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करके अपने परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।

कांवड़ यात्रा होती है बेहद खास
सावन की सबसे बड़ी और भव्य परंपराओं में से एक है कांवड़ यात्रा। शिवभक्त नंगे पैर गंगाजी या पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल यात्रा करते हैं और भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों या स्थानीय शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। यह परंपरा अनुशासन, त्याग, भक्ति और अटूट विश्वास का उदाहरण है।
सात्विक जीवन और सोमवार के व्रत
सावन के महीने में खान-पान को लेकर भी विशेष नियम निभाए जाते हैं। लोग पूरे महीने प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा से दूर रहकर सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। सावन के सोमवार के व्रत रखने की परंपरा बहुत पुरानी है। इसके पीछे धार्मिक मान्यता तो है ही, साथ ही स्वास्थ्य संबंधी कारण भी है वर्षा ऋतु में पाचन क्रिया धीमी हो जाती है, इसलिए सात्विक और हल्का भोजन करने की सलाह दी जाती है।

