संघ की दृष्टि में नारी समाज को दिशा देने वाली शक्ति और राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण धुरी : शोभा विजेंद्र
नई दिल्ली, 03 सितंबर (हि.स.)। भुवनेश्वर में उत्कल बिपन्न सहायता समिति ने दिल्ली की लेखिका एवं समाजसेविका डॉ. शोभा विजेंद्र द्वारा रचित पुस्तक शतायु संघ और महिला सहभागिता पर आज विचारोत्तेजक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ओडिशा विधानसभा की अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। अखिल भारतीय साहित्य परिषद, ओडिशा की उपाध्यक्ष प्रो. डॉ. स्मरप्रिया मिश्रा सम्मानित अतिथि के रूप में सम्मिलित हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय स्त्री शक्ति की राष्ट्रीय सहसचिव चंदना दास ने की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय सह संयोजक कुटुंब प्रबोधन गतिविधि सह प्रांत संघचालक मनसुख सेठिया इस अवसर पर उपस्थित रहे।
डॉ. शोभा विजेंद्र ने अपने संबोधन में कहा कि संघ को लेकर महिलाओं की भूमिका के संबंध में कई भ्रांतियां और नैरेटिव लंबे समय से प्रचारित किए जाते रहे हैं, जबकि इतिहास और संघ के विचार इसके विपरीत एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने 1936 में वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर जी और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि इसी आत्मीय सहयोग से राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। उन्होंने कहा कि संघ की दृष्टि में नारी केवल परिवार की भूमिका तक सीमित नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली शक्ति और राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण धुरी है।
विभिन्न सरसंघचालकों के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं की सहभागिता को सदैव सम्मान, नेतृत्व और राष्ट्रहित से जोड़ा गया है। पुस्तक “शतायु संघ और महिला सहभागिता” का उद्देश्य भी इन्हीं तथ्यों और अनुभवों के माध्यम से प्रचलित भ्रांतियों को दूर कर संघ में महिला सहभागिता के वास्तविक स्वरूप को सामने रखना है।
प्रो. डॉ. स्मरप्रिया मिश्रा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी सदैव परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति रही है। वह संस्कारों की वाहक और समाज की निर्माता है। उन्होंने कहा कि आज महिलाओं को राष्ट्रसेवा और समाज निर्माण के अनेक अवसर मिल रहे हैं, जिन्हें सार्थक करते हुए हमें अपने जीवन को मातृभूमि के प्रति समर्पित करना चाहिए।
चंदना दास ने अपने सम्बोधन में पुस्तक को संघ परिवार की आत्मीयता, कुटुंब भाव और महिलाओं के योगदान का जीवंत दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि इसमें महिला कार्यकर्ताओं के अनुभवों के साथ मुस्लिम महिला की सहभागिता और लैंगिक समानता जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को भी स्थान मिला है। उन्होंने सभी से पुस्तक पढ़ने का आग्रह करते हुए कहा कि महिला शक्ति और राष्ट्र निर्माण में सहभागिता का यह एक प्रेरणादायी उदाहरण है।
मनसुख सेठिया ने कहा कि संघ में महिलाओं की सहभागिता को लेकर समाज में जान-बूझकर भ्रम फैलाया जाता है, जबकि संघ की स्थापना से लेकर आज तक राष्ट्र निर्माण की विभिन्न गतिविधियों में महिलाओं की सक्रिय भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि पुरुषों और महिलाओं की शाखाएं अलग होना केवल शारीरिक संरचना और कार्यपद्धति की आवश्यकता है, सहभागिता में कोई भेद नहीं। उन्होंने “शतायु संघ और महिला सहभागिता” को तथ्यों, विचारों और अनुभवों का महत्वपूर्ण संकलन बताते हुए कहा कि यह पुस्तक प्रचलित भ्रम और नैरेटिव को प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट करने में उपयोगी होगी।
सुरमा पाढ़ी ने लेखिका के लंबे सामाजिक जीवन, सेवा कार्यों तथा पुस्तक में संकलित 34 से अधिक महिलाओं के अनुभवों और विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पुस्तक महिला सहभागिता की एक व्यापक और सार्थक तस्वीर प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि संघ की दृष्टि में महिला केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली शक्ति है। वंदनीय मौसी जी के शब्दों को दोहराते हुए उन्होंने कहा, “समाज रूपी रथ का रथी पुरुष है, लेकिन उसकी सारथी महिला है।”
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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव

