शंकराचार्य ने भारत को व्यवस्थित ही नहीं, अखंड धारा के रूप में प्रवाहित भी कियाः एन. वेंकटरामन

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शंकराचार्य ने भारत को व्यवस्थित ही नहीं, अखंड धारा के रूप में प्रवाहित भी कियाः एन. वेंकटरामन


शंकराचार्य ने भारत को व्यवस्थित ही नहीं, अखंड धारा के रूप में प्रवाहित भी कियाः एन. वेंकटरामन


शंकराचार्य ने भारत को व्यवस्थित ही नहीं, अखंड धारा के रूप में प्रवाहित भी कियाः एन. वेंकटरामन


- ओंकारेश्वर में एकात्म पर्व के संवाद सत्र में शामिल हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल वेंकटरामन

इंदौर, 20 अप्रैल (हि.स.)। भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरामन ने जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के अद्वितीय योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि शंकराचार्य ने भारत की आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं को न केवल व्यवस्थित किया, बल्कि उन्हें एक अखंड धारा के रूप में प्रवाहित भी किया।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरामन मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में आयोजित पांच दिवसीय एकात्म पर्व के चतुर्थ दिवस सोमवार को संवाद सत्र को संबोधित कर रहे थे। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, मध्य प्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा आदि गुरु शंकराचार्य के प्रकटोत्सव वैशाख शुक्ल पंचमी के उपलक्ष्य 17 से 21 अप्रैल तक ओंकारेश्वर पर एकात्म पर्व का आयोजन किया जा रहा है।

एकात्म पर्व के चौथे दिन सोमवार को संवाद सत्र में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरामन मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। उन्होंने अपने वक्तव्य में मंदिर परंपरा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि शंकराचार्य ने दिशाओं के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानों की उपयोगिता के अनुसार मंदिर व्यवस्था विकसित की। उन्होंने ऐसी पूजा-पद्धतियाँ स्थापित कीं, जो आज भी पूरे देश में समान रूप से प्रचलित हैं। उदाहरण स्वरूप उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की प्रातःकालीन भस्म आरती और तिरुपति बालाजी की सुप्रभात सेवा आज भी उसी अनुशासन और विधि का पालन करती हैं। वेंकटरामन ने इसे भारत की प्राचीन “स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर” की परंपरा बताया, जो सदियों से अक्षुण्ण बनी हुई है।

अद्वैत: वाद नहीं, निर्विवाद सत्य: स्वामिनी विमलानंद

‘चिन्मय मिशन की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक यात्रा’ सत्र में कोयम्बटूर के स्वामिनी विमलानंद सरस्वती ने कहा कि आदि शंकराचार्य ने अद्वैत की समृद्ध परंपरा स्थापित की, जबकि स्वामी चिन्मयानंद ने उसे जन-जन तक पहुँचाने का सशक्त कार्य किया। उन्होंने कहा कि आज देश में जब भी वेदांत की चर्चा होती है, तो उसका केंद्र अद्वैत ही होता है, और इसकी व्यापक स्वीकृति में चिन्मयानंद के प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अद्वैत कोई वाद नहीं है, क्योंकि वाद का प्रतिवाद होता है, जबकि अद्वैत एक निर्विवाद सत्य है। चिन्मयानंद जटिल सिद्धांतों को भी इतनी सरल भाषा में समझाते थे कि बच्चे भी उसे सहजता से समझ सकें।

स्वामी अद्वैतानंद ने चिन्मय मिशन के जनकल्याण कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत को केवल कृषि प्रधान देश कहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह ‘ऋषि प्रधान देश’ है। उन्होंने बताया कि चिन्मयानंद ने स्वामी शिवानंद से प्रेरित होकर 100 विवेकानंद तैयार करने का संकल्प लिया और इसी उद्देश्य से चिन्मय मिशन की स्थापना की।

स्वामी वेदतत्त्वानंद ने नचिकेता और यमराज के संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि नचिकेता की प्रश्नशील बुद्धि हमें चिन्मयानंद में भी दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि “जब मैं चिन्मयानंद को पढ़ता हूँ, तो मेरे सामने नचिकेता जीवंत हो उठते हैं।” उनके अनुसार, प्रत्येक मनुष्य के भीतर ‘चिन्मय’ का निवास है, और उसे पहचान कराना ही चिन्मय मिशन का उद्देश्य है।

कार्यक्रम में अद्वैत वेदांत के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले ‘शंकरदूतों’ को सम्मानित किया गया। यह सम्मान परमपूज्य जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज द्वारा प्रदान किया गया। इस अवसर पर चयनित श्रेष्ठ प्रस्तावों का प्रस्तुतीकरण भी किया गया।

मंगलवार को होगा समापन

एकात्म पर्व का मंगलवार को प्रातः 10 बजे से आयोजित अलंकरण समारोह के साथ समापन होगा। इस अवसर पर विशेष रूप से संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र लोधी, जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि उपस्थित रहेंगे। इस अवसर पर देश-विदेश के 700 से अधिक युवा अभय घाट पर नर्मदा तट पर शंकरदूत के रूप में दीक्षा लेंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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