Sawan 2026 : BHU में है अनोखा रसेश्वर महादेव मंदिर: जहां आयुर्वेद दवाओं का भोलेनाथ को लगता है भोग 

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सावन में बाबा के अलग-अलग रूपों के दर्शन और पूजन का विशेष महत्व होता है। हर कोई बाबा को फूल मालाओं के साथ ही अलग-अलग तरीके का भोग भी लगाता है। इसी तरह बीएचयू कैंपस में एक ऐसा मंदिर है जहां बाबा को दवाओं का भोग लगाया जाता है। और तो और बीएचयू के छात्र यहां पढ़ाई करने के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी करते हैं।

रसेश्वर महादेव मंदिर

आईएमएस बीएचयू के आयुर्वेद संकाय के रस शास्त्र विभाग में शोध और दवाएं बनती हैं। विभाग के परिसर में ही रसेश्वर महादेव का मंदिर है। शोध के बाद जो भी दवाएं तैयार होती हैं वह पहले बाबा को चढ़ाई जाती है। उसके बाद इसका उपचार में इस्तेमाल होता है। बीएचयू दृश्य कला संकाय के सामने स्थित रस शास्त्र विभाग में इस मंदिर की स्थापना की पहल 2012 में की गई थी। 2015 में मंदिर के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। 

कोई भी दवा तैयार होने पर सबसे पहले बाबा को भोग लगाया जाता है.

आयुर्वेद संकाय के रस शास्त्र विभाग में स्थित इस मंदिर की कहानी है दिलचस्प। प्रोफेसर आनंद चौधरी, जिन्होंने इस मंदिर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बताते हैं कि मंदिर का निर्माण भिक्षाटन के साथ हुआ। यह परंपरा महामना मदन मोहन मालवीय की विचारधारा से प्रेरित है।मंदिर की सबसे खास बात है यहां की पूजा पद्धति। जब भी कोई नई दवा या भस्म तैयार की जाती है, उसे सबसे पहले भगवान शिव और धन्वंतरि को अर्पित किया जाता है। यह प्रथा न केवल आध्यात्मिक महत्व रखती है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्रासंगिक है।

मंदिर परिसर की एक और विशेषता है इसका शांत वातावरण। यह स्थान छात्रों के लिए एक ओपन लाइब्रेरी की तरह काम करता है, जहां वे 24 घंटे अध्ययन कर सकते हैं। कई छात्रों ने यहां तैयारी करके सफलता प्राप्त की है।

BHU का आयुर्वेद संकाय, जिसकी स्थापना 1922 में हुई थी, भारत के सबसे पुराने चिकित्सा संस्थानों में से एक है। रसेश्वर महादेव मंदिर इस विरासत का एक जीवंत उदाहरण है, जो प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु का काम करता है।आज भी, जब कोई नया शोध या दवा विकसित की जाती है, वैज्ञानिक उसे भगवान शिव को अर्पित करते हैं। 

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महादेव मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह आयुर्वेद और आध्यात्म के समन्वय का एक जीवंत उदाहरण भी है। यह मंदिर BHU की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

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