(अपडेट) मप्र में संघ का महामंथन : आम्बेकर बोले-शताब्दी वर्ष में देशभर में किए गए संगठनात्मक विस्तार से भविष्य के विस्तार तक बनेगी नई कार्ययोजना

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(अपडेट) मप्र में संघ का महामंथन : आम्बेकर बोले-शताब्दी वर्ष में देशभर में किए गए संगठनात्मक विस्तार से भविष्य के विस्तार तक बनेगी नई कार्ययोजना


-डॉ. मोहन भागवत, दत्तात्रेय होसबाले समेत 408 प्रमुख संघ पदाधिकारी ले रहे भाग

इंदौर, 31 अक्टूबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने शनिवार को कहा कि शताब्दी वर्ष में देशभर में किए गएसंगठनात्मक विस्तार से भविष्य के विस्तार तक नई कार्ययोजना बनेगी।

सुनील आंबेकर ने कहा कि संघ अपने शताब्दी वर्ष में देशभर में किए गए संगठनात्मक विस्तार, सामाजिक संपर्क और सेवा गतिविधियों के अनुभवों को अब भविष्य की कार्ययोजना में ढालने की तैयारी में है। इसके लिए 2 से 4 नवंबर तक इंदौर के डेली कॉलेज मैदान में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की वार्षिक बैठक की जाएगी। उन्होंने आज यहां पत्रकारों से बातचीत में इसकी विस्तार से जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले सहित संघ के शीर्ष नेतृत्व तथा देशभर से आए 408 प्रमुख कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में होने वाला यह तीन दिवसीय मंथन संगठन की आगामी दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।

उन्होंने बताया कि बैठक में शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की समीक्षा के साथ संगठन के विस्तार, हिंदू सम्मेलनों, गृह संपर्क अभियान, सेवा कार्यों में समाज की भागीदारी और युवाओं तथा महिलाओं के बीच बढ़े संपर्क का आकलन किया जाएगा। साथ ही संगठनात्मक संरचना में संभावित बदलाव, जनजागरण, पंचपरिवर्तन, नशीली दवाओं की चुनौती, डिजिटल माध्यमों पर प्रसारित सामग्री, बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप और वैश्विक परिस्थितियों पर भी विचार होगा। सरसंघचालक के विदेश प्रवासों से मिले अनुभव और दुनिया के प्रमुख लोगों के साथ संवाद को आगे बढ़ाने की रणनीति भी बैठक के एजेंडे में रहेगी।

13 हजार नई शाखाओं से संगठन विस्तार की नई तस्वीर

संघ की इस बैठक के केंद्र में संगठन के विस्तार से जुड़े आंकड़े और शताब्दी वर्ष के दौरान सामने आए अनुभव रहेंगे। अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख के अनुसार, देशभर में संघ की दैनिक शाखाओं की संख्या बढ़कर 1,01,151 हो गई है। इसके अतिरिक्त साप्ताहिक, मासिक और अन्य प्रकार के मिलन कार्यक्रम 1,10,849 स्थानों तक पहुंच चुके हैं। अक्टूबर 2025 से अब तक देशभर में 13 हजार नई शाखाएं प्रारंभ हुई हैं। ये आंकड़े संघ की संगठनात्मक गतिविधियों के भौगोलिक विस्तार की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

आंबेकर ने कहा, संघ ने शताब्दी वर्ष से पहले तीन वर्षों के लिए कार्यविस्तार की योजना बनाई थी। इस अवधि में संगठन की पहुंच बढ़ाने, समाज के विभिन्न वर्गों तक संपर्क स्थापित करने और स्वयंसेवकों की भागीदारी को व्यापक बनाने पर जोर रहा। अब शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की श्रृंखला पूरी होने के बाद अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल में इस पूरी प्रक्रिया का आकलन होगा। कहां संगठन की गतिविधियां बढ़ीं, किन क्षेत्रों में समाज की भागीदारी अधिक रही और प्राप्त अनुभवों के आधार पर आगे किन विषयों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, इन पहलुओं पर चर्चा होगी।

65,660 हिंदू सम्मेलन, सामाजिक संपर्क बना प्रमुख आधार

उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष के दौरान आयोजित हिंदू सम्मेलन संघ की सामाजिक संपर्क गतिविधियों का एक प्रमुख हिस्सा रहे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गांवों के समूहों को मिलाकर बनाए गए मंडलों और शहरी बस्तियों के स्तर पर अब तक 65,660 हिंदू सम्मेलन आयोजित किए गए हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद और सहभागिता बढ़ाने के प्रयास किए गए।

बैठक में इन सम्मेलनों के अनुभवों की समीक्षा के साथ यह भी विचार होगा कि उनसे मिले सुझावों और सामाजिक प्रतिक्रियाओं को आगामी गतिविधियों में किस तरह शामिल किया जाए। संघ के लिए यह समीक्षा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि शताब्दी वर्ष के दौरान आयोजित कार्यक्रमों को आगे निरंतर सामाजिक संपर्क और सहभागिता से जोड़ने की दिशा तैयार की जा सके। गृह संपर्क अभियान भी बैठक के प्रमुख विषयों में रहेगा।

उन्होंने बताया कि इस अभियान में समाज का अच्छा सहयोग मिला। सेवा कार्यों के विस्तार और सामाजिक हित में काम करने वाले विभिन्न संगठनों के बढ़ते उत्साह पर भी चर्चा होगी। कई संगठनों ने संघ के साथ मिलकर कार्य करने की इच्छा जताई है। आवश्यकता के अनुसार स्वयंसेवकों के सहयोग से ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाने पर विचार किया जाएगा।

महिलाओं और युवाओं की भागीदारी का भी होगा आकलन

शताब्दी वर्ष के दौरान हुए कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। गृह संपर्क अभियान, हिंदू सम्मेलनों और अन्य गतिविधियों के अनुभवों में यह पहलू सामने आया है। इसके अतिरिक्त शहरों, गांवों और शैक्षणिक संस्थानों में युवाओं के लिए आयोजित कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में युवक-युवतियों ने भाग लिया।

अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल में इन कार्यक्रमों की समीक्षा सकारात्मक दृष्टि से किए जाने की तैयारी है। समाज के जिन वर्गों तक संपर्क बढ़ा है, उनसे प्राप्त सुझावों और अपेक्षाओं के आधार पर आगे की गतिविधियों की दिशा तय करने पर विचार होगा। युवाओं के बीच संवाद, सामाजिक विषयों पर जागरूकता और सेवा कार्यों में सहभागिता जैसे पहलुओं को लेकर मिले अनुभव इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे।

इंदौर बैठक का एक महत्वपूर्ण एजेंडा संघ की संगठनात्मक रचना में संभावित परिवर्तन भी है। आंबेकर के अनुसार, संगठनात्मक संरचना को लेकर पहले विचार-विमर्श हुआ है। अब अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में इस विषय पर आगे चर्चा होगी और भावी व्यवस्था के स्वरूप पर विचार किया जाएगा। प्रस्तावित संगठनात्मक रचना के अनुरूप अगले वर्ष मार्च से काम शुरू करने की तैयारी है। ऐसे में बैठक में होने वाला विचार-विमर्श संगठन की आगामी कार्यप्रणाली के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा। इसके साथ संगठनात्मक कार्यों में जनजागरण की भूमिका पर भी चर्चा प्रस्तावित है।

संघ के अनुसार, सामाजिक जीवन में कई ऐसे विषय सामने आते हैं जिन पर सही जानकारी और दृष्टिकोण समाज तक पहुंचाना आवश्यक होता है। ऐसे विषयों को जनजागरण के माध्यम से प्रभावी ढंग से सामने रखने के तरीकों पर विचार किया जाएगा। बैठक में इस बात पर भी मंथन होगा कि सामाजिक संपर्क से मिले अनुभवों को संगठन के आगामी कार्यक्रमों से किस प्रकार जोड़ा जाए।

नशीली दवाओं से डिजिटल कंटेंट तक, चुनौतियों पर मंथन

बैठक में संगठनात्मक विस्तार के साथ समकालीन सामाजिक चुनौतियों और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर भी व्यापक चर्चा होगी। नशीली दवाओं की बढ़ती समस्या, नए डिजिटल माध्यमों पर प्रसारित होने वाली सामग्री, बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप और बदलता वैश्विक परिदृश्य प्रमुख विषयों में शामिल हैं।

विजयादशमी के अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के उद्बोधन में उठाए गए महत्वपूर्ण मुद्दों पर आगे की कार्यदिशा को लेकर भी चर्चा होगी। सामाजिक परिस्थितियों में सामने आ रही चुनौतियों के संदर्भ में जनजागरण और संगठनात्मक गतिविधियों की भूमिका पर विचार किया जाएगा। इन चर्चाओं के आधार पर आगामी समय की प्राथमिकताओं और कार्यक्रमों को दिशा देने का प्रयास होगा।

इसके साथ ही आम्बेकर ने बताया कि संघ के पंचपरिवर्तन से जुड़े विषय भी बैठक के एजेंडे में शामिल हैं। इन विषयों को लेकर आगे की योजना तैयार करने पर विचार होगा। शताब्दी वर्ष के दौरान हुए कार्यक्रमों से मिले अनुभवों को आगामी गतिविधियों से जोड़ना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पहलू रहेगा।

अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के प्रवास से मिले अनुभव भी एजेंडे में

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के इस वर्ष अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के प्रवासों पर भी अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल में चर्चा होगी। इन प्रवासों के दौरान उन्होंने हिंदुत्व की अवधारणा, भारत की प्रगति और विश्व शांति के संदर्भ में भारत की भूमिका जैसे विषयों पर अपने विचार रखे। विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख लोगों के साथ हुए संवाद के अनुभवों की भी समीक्षा की जाएगी। इसके साथ ही आगामी समय में वैश्विक संपर्क और संवाद के प्रयासों को आगे बढ़ाने के विषय पर भी विचार होगा। बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच भारत के विचारों और दृष्टिकोण को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने से जुड़े अनुभव इस चर्चा का हिस्सा होंगे। सरसंघचालक के आगामी वर्ष के प्रवास कार्यक्रमों की योजना पर भी बैठक में विचार किया जाएगा।

पत्रकार वार्ता में संघ की आगामी कार्ययोजना से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए आंबेकर ने स्पष्ट किया कि शताब्दी वर्ष संघ के लिए व्यापक सामाजिक संपर्क और संवाद का अवसर बना है। इस दौरान गृह संपर्क, हिंदू सम्मेलन और विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचने का प्रयास किया गया। अब इन पहलों को आगे बढ़ाने और उनके प्रभाव को व्यापक बनाने पर ध्यान दिया जाएगा।

संत रविदास की 650वीं जयंती पर देशव्यापी आयोजन

उन्होंने बताया कि इस वर्ष संत रविदास जी की 650वीं जयंती है। संघ ने अपनी पिछली बैठक में इस संबंध में वक्तव्य जारी किया था। इसके बाद देशभर में संघ के कार्यकर्ताओं की ओर से विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। संत रविदास के विचारों, सामाजिक समरसता और समाज को जोड़ने वाली उनकी दृष्टि को व्यापक स्तर पर पहुंचाने के लिए ये आयोजन किए जा रहे हैं। संघ की पंच परिवर्तन संबंधी पहल के संदर्भ में भी इस विषय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

उन्होंने कहा कि शताब्दी वर्ष के दौरान संघ ने समाज के सामने पंच परिवर्तन के पांच विषय रखे थे। गृह संपर्क, हिंदू सम्मेलन और अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से इन विषयों को समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। संघ की कोशिश है कि ये विषय सामाजिक जीवन में व्यवहार और सामूहिक सहभागिता का हिस्सा बनें।

संघ से प्रेरित संगठनों की संख्या बढ़ाने के सवाल पर आंबेकर ने कहा कि यह एक सतत प्रक्रिया है। समय के साथ समाज के सामने नए विषय और कार्यक्षेत्र आते हैं। ऐसे विषयों पर काम करने की आवश्यकता महसूस होने पर पहल की जाती है और आगे चलकर उनके लिए अलग संगठन भी विकसित हो सकते हैं। उन्होंने भविष्य में विस्तार की संभावना से इनकार नहीं किया, हालांकि स्पष्ट किया कि फिलहाल इस संबंध में कोई तत्काल योजना विचाराधीन नहीं है।

डिजिटल मीडिया, नए संचार माध्यमों और विभिन्न प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने वाली सामग्री के संबंध में आंबेकर ने कहा कि संघ समकालीन मुद्दों पर नियमित चर्चा और समीक्षा करता है। शताब्दी वर्ष में संघ ने अपने विचारों, हिंदुत्व की अवधारणा, भारत की पहचान, देश की भावी दिशा और समाज में भ्रम पैदा करने वाले तत्वों को लेकर अपना दृष्टिकोण सामने रखने का प्रयास किया है। उन्होंने साफ किया कि संघ किसी माध्यम अथवा नई तकनीक का विरोधी नहीं है।

संघ के विचारों और हिंदुत्व की अवधारणा पर सार्वजनिक विमर्श को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि पिछले सौ वर्षों से संघ की राष्ट्रीय सोच और विचारधारा पर चर्चा होती रही है। संघ ऐसी चर्चाओं के लिए हमेशा तैयार रहा है। सरसंघचालक से लेकर संगठन के अन्य पदाधिकारी भी संवाद के लिए उपलब्ध रहते हैं।

संघ में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए किसी विशेष रणनीति की आवश्यकता से इनकार करते हुए उन्होंने कहा कि संघ की संगठनात्मक संरचना ही युवाओं तक पहुंचने और उन्हें गतिविधियों से जोड़ने पर आधारित है। युवाओं के साथ नियमित संवाद होता है और वे लगातार संघ के कार्यक्रमों में सहभागी बन रहे हैं।

उन्होंने बताया कि संघ के प्रारंभिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हजारों नए लोगों ने हिस्सा लिया है। पिछले वर्ष प्रशिक्षण कार्यक्रमों में लगभग दो लाख लोग शामिल हुए थे। शताब्दी वर्ष के दौरान विशेष युवा सम्मेलन भी आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में युवाओं के सवालों और शंकाओं पर चर्चा की गई तथा संघ का दृष्टिकोण उनके सामने रखा गया। सरसंघचालक ने भी विभिन्न स्थानों पर युवाओं के साथ संवाद किया।

वैश्विक अस्थिरता, भारत की आर्थिक स्थिति और देश को मजबूत बनाने में संघ की भूमिका पर पूछे गए सवाल के जवाब में आंबेकर ने कहा कि दुनिया के अनेक हिस्सों में अस्थिरता के बावजूद भारत ने स्थिरता बनाए रखी है और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि संघ का हमेशा से मानना रहा है कि देश की प्रगति में समाज की सकारात्मक भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य से संघ समाज की सहभागिता बढ़ाने के लिए काम करता है। संघ से जुड़े विभिन्न संगठनों ने भी समय-समय पर आर्थिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर अपने विचार समाज और सरकार के सामने रखे हैं। भारत को प्रत्येक क्षेत्र में सक्षम और मजबूत बनाने के लिए आवश्यक प्रयास जारी रहेंगे।

आंदोलनों पर संघ का नजरिया : देशहित सर्वोपरि

देश में होने वाले आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के प्रति संघ के रुख पर आंबेकर ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि देश में उठने वाले प्रत्येक मुद्दे पर संघ को पक्ष अथवा विपक्ष में खड़ा मानने की अपेक्षा क्यों की जानी चाहिए? नागरिकों को देश से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाने और अपनी बात रखने का अधिकार है। इसके साथ ही उन्होंने आंदोलनों के उद्देश्य और उनकी दिशा को लेकर सावधानी बरतने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, यह सुनिश्चित होना चाहिए कि आंदोलन देशहित में हों और देश को आगे ले जाने की भावना से संचालित हों। कोई भी ताकत उनका दुरुपयोग करके राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध काम करने वाले तत्वों को उनमें प्रवेश का अवसर न दे। संघ इस पहलू पर लगातार नजर रखता है।

संघ की अवधारणा में परम वैभव का अर्थ स्पष्ट करते हुए आंबेकर ने कहा कि भारत ऐसा समृद्ध राष्ट्र बने, जहां किसी व्यक्ति को अभाव का सामना न करना पड़े। देश खुशहाल और सुरक्षित हो तथा सामाजिक बुराइयों से मुक्त समाज का निर्माण हो। लोगों के बीच परस्पर प्रेम, आत्मीयता और सद्भाव की भावना मजबूत हो। उन्होंने कहा कि भारत जब इस स्तर की राष्ट्रीय क्षमता विकसित कर लेगा, तब वह अपनी प्रगति के साथ विश्व कल्याण में भी प्रभावी योगदान दे सकेगा। दुनिया में सकारात्मक शक्तियों का साथ देने और आतंकवादी तथा विनाशकारी ताकतों को मानवता के लिए खतरा बनने से रोकने की सामर्थ्य भी भारत में होनी चाहिए। ऐसी राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण और उसे बनाए रखना ही परम वैभव की मूल अवधारणा है।

यूजीसी सर्कुलर को बताया असंतुलित, सामाजिक एकता बनाए रखने की अपील

यूजीसी के सर्कुलर और समाज के कुछ वर्गों की चिंताओं पर आंबेकर ने कहा कि संघ पहले ही इस संबंध में अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुका है और संबंधित सर्कुलर को असंतुलित बताया है। यह विषय संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में लाया गया है। सरकार और यूजीसी ने भी इस पर ध्यान दिया है। न्यायालय की ओर से इस पर रोक लगाए जाने के बाद मामला विचाराधीन है। उन्होंने कहा कि इस विषय में आगे की कोई भी कार्रवाई संतुलित दृष्टिकोण के आधार पर होनी चाहिए। वहीं, संघ के संगठनात्मक स्वरूप और उसके पंजीकरण को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में संगठन के रूप में पंजीकरण कराने का कोई प्रस्ताव अथवा विचार फिलहाल नहीं है।

46 प्रांतों और 11 क्षेत्रों के प्रमुख पदाधिकारी होंगे शामिल

तीन दिवसीय बैठक में संघ के सभी छह सह सरकार्यवाह, अखिल भारतीय कार्य विभागों के प्रमुख और कार्यकारिणी के सदस्य शामिल होंगे। इसके अतिरिक्त देशभर के 46 प्रांतों के प्रांत संघचालक, प्रांत कार्यवाह, प्रांत प्रचारक, सह प्रचारक तथा उनके सहयोगी पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे। संघ के सभी 11 क्षेत्रों के प्रमुख पदाधिकारी भी बैठक में अपेक्षित हैं। इस तरह संगठन के राष्ट्रीय नेतृत्व से लेकर विभिन्न प्रांतों और क्षेत्रों के प्रमुख कार्यकर्ताओं तक की भागीदारी रहेगी।

उल्लेखनीय है कि शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की पूर्णता के बाद इंदौर में हो रहा यह आयोजन संघ के लिए बीते एक वर्ष के अनुभवों की समीक्षा और आगामी वर्षों की प्राथमिकताओं पर विचार का अवसर होगा। शाखाओं के विस्तार, सामाजिक संपर्क, सेवा कार्यों, संगठनात्मक संरचना और वैश्विक संवाद जैसे विषयों पर होने वाला मंथन यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि शताब्दी वर्ष के दौरान बनी गति को आगे किस प्रकार निरंतरता दी जाए।

इस पत्रकार वार्ता में संघ के अभा प्रचार प्रमुख के साथ मंच पर मालवा प्रांत के संघचालक डॉ. प्रकाश शास्त्री उपस्थित रहे। वहीं विशेष रूप से अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर, प्रदीप जोशी एवं मध्य क्षेत्र के प्रचार प्रमुख कैलाशचंद्र उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

Livevns.news Desk
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