पेरुमाल मुरुगन को मिलेगा मानबहादुर सिंह लहक सम्मान, 01 नवंबर को नमक्कल में होगा सम्मान समारोह

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पेरुमाल मुरुगन को मिलेगा मानबहादुर सिंह लहक सम्मान, 01 नवंबर को नमक्कल में होगा सम्मान समारोह


पेरुमाल मुरुगन को मिलेगा मानबहादुर सिंह लहक सम्मान, 01 नवंबर को नमक्कल में होगा सम्मान समारोह


नई दिल्ली, 19 जुलाई (हि.स.)। तमिल के प्रख्यात साहित्यकार पेरुमाल मुरुगन को इस वर्ष मानबहादुर सिंह लहक सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। भारतीय भाषा एकता मंच के बैनर तले आयोजित होने वाला यह सम्मान समारोह 01 नवंबर को तमिलनाडु के नमक्कल जिले में आयोजित किया जाएगा, जो पेरुमाल मुरुगन का गृह जिला भी है।

भारतीय भाषा एकता मंच ने कहा कि पेरुमाल मुरुगन समकालीन भारतीय साहित्य के उन विरल रचनाकारों में हैं, जिन्होंने तमिल भाषा, ग्रामीण जीवन और सामाजिक यथार्थ को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया। उनकी लेखनी केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज है। वे बाजारवाद और उत्तर-आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में भी अपनी भाषा, लोकजीवन और सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध रहे हैं।

मंच के अनुसार, मुरुगन का लेखन उन परंपराओं और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध प्रतिरोध दर्ज करता है, जो मनुष्य की स्वतंत्रता और गरिमा में बाधा बनती हैं। उनकी रचनाएं समाज में संवाद, संवेदना और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने का कार्य करती हैं।

मंच ने बताया कि यह सम्मान साहित्यकार मानबहादुर सिंह की स्मृति में दिया जाता है, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से नैतिकता, ईमानदारी और सामाजिक न्याय के पक्ष में लगातार संघर्ष किया। उन्होंने लेखकीय दायित्वों से कभी समझौता नहीं किया और सामाजिक मूल्यों की रक्षा के लिए आजीवन प्रतिबद्ध रहे। इसी वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाले रचनाकार के रूप में पेरुमाल मुरुगन का चयन किया गया है।

भारतीय भाषा एकता मंच का मानना है कि भारत की भाषाई विविधता को जोड़ना समय की आवश्यकता है। मंच विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य और रचनाकारों के बीच संवाद स्थापित करने तथा पारस्परिक समझ विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहा है।

पेरुमाल मुरुगन की चर्चित कृतियों में 'माधोरुबागन', 'पूक्कुझि' और 'अर्धनारी' प्रमुख हैं। उनकी रचनाओं में ग्रामीण समाज, जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, सामाजिक परंपराओं और मानवीय संघर्षों का अत्यंत संवेदनशील चित्रण मिलता है। उनकी भाषा सरल, सहज और जीवन के अनुभवों से गहराई से जुड़ी हुई मानी जाती है।

वर्ष 2015 में उपन्यास 'माधोरुबागन' को लेकर विवाद के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से लेखक पेरुमाल मुरुगन मर गया है जैसी टिप्पणी की थी, लेकिन बाद में उन्होंने पुनः लेखन शुरू किया और पहले से अधिक सशक्त रचनाओं के साथ साहित्य जगत में लौटे। आज उन्हें भारतीय भाषाओं के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली लेखकों में गिना जाता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / आकाश कुमार राय

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