कॉटन विश्वविद्यालय में परंपरा से परिवर्तन विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
गुवाहाटी, 18 जुलाई (हि.स.)। भारतीय इतिहास संकलन समिति की ओर से आयोजित चार दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शनिवार को गुवाहाटी के कॉटन विश्वविद्यालय स्थित कलागुरु विष्णु प्रसाद राभा प्रेक्षागृह में विधिवत उद्घाटन हुआ। भारतीय इतिहास संकलन समिति, असम के तत्वावधान में कॉटन विश्वविद्यालय, उत्तर लखीमपुर विश्वविद्यालय तथा नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी (शिलांग) के संयुक्त सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी का मुख्य विषय परंपरा से परिवर्तन : आधुनिक शासन व्यवस्था में भारतीय इतिहास एवं ज्ञान परंपरा का समन्वय है। संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को समकालीन संदर्भों में पुनर्परिभाषित करते हुए आधुनिक शासन व्यवस्था और राष्ट्रीय विकास से जोड़ना है।
उद्घाटन सत्र में आज मुख्यमंत्री के प्रेस सचिव एवं विधायक तरंग गोगोई तथा गुवाहाटी सेंट्रल के विधायक विजय गुप्ता सम्मानित अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। दोनों अतिथियों ने भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि देश की प्राचीन ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक सही स्वरूप में पहुंचाना समय की मांग है।
कार्यक्रम में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. ईश्वर चरण विश्वकर्मा, राष्ट्रीय सचिव डॉ. बाल मुकुंद पांडेय, राष्ट्रीय महासचिव हेमंत धिंग मजूमदार, संरक्षण प्रमुख गोपाल नारायण सिंह, कॉटन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. रमेश डेका, कुलसचिव डॉ. हीरेन डेका सहित देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, महाविद्यालयों के प्राचार्य, इतिहासकार, शिक्षाविद, शोधार्थी और युवा इतिहासकार बड़ी संख्या में शामिल हुए।
अपने मुख्य वक्तव्य में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय सचिव डॉ. बाल मुकुंद पांडेय ने कहा कि प्रागैतिहासिक काल से ही भारतीय सभ्यता और ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण तथा मानवीय मूल्यों पर आधारित रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण अध्याय और सांस्कृतिक धरोहर समय के साथ उपेक्षित होते गए हैं, जिनका पुनर्संकलन और पुनर्प्रस्तुतीकरण आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मातृभूमि के लिए त्याग और बलिदान देने वाले वीर पुरुषों तथा राष्ट्रनिर्माताओं के योगदान को इतिहास में उचित स्थान मिलना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनसे प्रेरणा प्राप्त कर सकें।
राष्ट्रीय महासचिव हेमंत धिंग मजूमदार ने अपने संबोधन में कहा कि वैश्वीकरण और तीव्र सूचना-प्रौद्योगिकी विकास के इस दौर में भारतीय संस्कृति की मूल जड़ों, परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 तथा आधुनिक शासन व्यवस्था के साथ समन्वित करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के विकास का भी मजबूत आधार है।
संगोष्ठी के अंतर्गत भारतीय विरासत के पुनरुद्धार, विविधता में एकता, स्वदेशी चेतना का संवर्धन, पारिवारिक प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान के समकालीन उपयोग, राष्ट्रीय विकास में इतिहास की भूमिका तथा सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण जैसे विषयों पर विभिन्न तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में देशभर से आए विद्वानों और शोधकर्ताओं ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए तथा भारतीय इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।
इसके अतिरिक्त भारतीय इतिहास संकलन समिति के विभिन्न राज्यों से आए राज्य सचिवों, सहायक सचिवों, संगठन सचिवों और सहायक संगठन सचिवों के लिए एक विशेष कार्यशाला का आयोजन भी किया गया। कार्यशाला में संगठन के विस्तार, इतिहास संकलन की कार्ययोजना, शोध गतिविधियों को बढ़ावा देने तथा युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने पर चर्चा की गई।
चार दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन 19 जुलाई को होगा। समापन समारोह में अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल के.टी. परनाइक मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। उनके अलावा देशभर के अनेक प्रख्यात इतिहासकार, शिक्षाविद और शोधकर्ता भी समापन सत्र में भाग लेकर भारतीय इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपरा के संरक्षण तथा उसके समकालीन महत्व पर अपने विचार साझा करेंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीप्रकाश

