मुकुल रॉय : चार दशक के उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक सफर का अंत

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मुकुल रॉय : चार दशक के उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक सफर का अंत


मुकुल रॉय : चार दशक के उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक सफर का अंत


कोलकाता, 23 फरवरी (हि.स.)। पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ राजनेता मुकुल रॉय का रविवार आधीरात निधन हो गया। वह 71 साल के थे। उनकी मौत के साथ ही पश्चिम बंगाल राज्य की राजनीति में एक युग का अंत हो गया। राज्य की वामपंथी सरकार को सत्ता से बेदखल करने और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को सत्ता दिलाने में उनकी अहम भूमिका रही। सही समय पर सही दांव लगाने में माहिर मुकुल राय बंगाल की राजनीति के चाणक्य कहे जाते थे।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुकुल रॉय का नाम लंबे समय तक प्रभाव, संगठन क्षमता और रणनीतिक कौशल के लिए लिया जाता रहा। करीब चार दशक के उनके राजनीतिक जीवन में कांग्रेस से लेकर तृणमूल कांग्रेस और फिर भारतीय जनता पार्टी तक का सफर शामिल रहा। वे उन चुनिंदा नेताओं में रहे जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर सत्ता की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कांग्रेस से अलग राह और तृणमूल की नींवः मुकुल रॉय ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत युवा कांग्रेस से की। संगठनात्मक कामकाज में उनकी सक्रियता ने उन्हें जल्द ही प्रदेश स्तर पर पहचान दिलाई। वर्ष 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, तब मुकुल रॉय उनके साथ खड़े हुए। तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में शामिल मुकुल रॉय ने पार्टी के प्रारंभिक ढांचे को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया और वे जमीनी स्तर पर संगठन विस्तार के प्रमुख सूत्रधार बने। उस दौर में जब तृणमूल कांग्रेस को राज्य की राजनीति में अपने लिए जगह बनानी थी, मुकुल रॉय को संगठन का मुख्य रणनीतिकार माना जाने लगा।

राज्यसभा से केंद्रीय मंत्री तक का सफरः वर्ष 2006 में मुकुल रॉय पहली बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। वर्ष 2009 में वे उच्च सदन में तृणमूल कांग्रेस के नेता बने और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की आवाज को मजबूती से रखने लगे। केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार के दौरान, जब तृणमूल कांग्रेस उसका हिस्सा थी, मुकुल रॉय को पहले पोत परिवहन राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में वर्ष 2012 में उन्हें रेल मंत्री का दायित्व सौंपा गया। रेल मंत्रालय संभालते समय उन्होंने यात्री सुविधाओं और परियोजनाओं को लेकर कई घोषणाएं कीं। हालांकि उनका कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा, लेकिन वे केंद्र की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए।

2011 के बाद नई भूमिका मेंः वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के 34 वर्षों के शासन का अंत हुआ और तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। इस ऐतिहासिक बदलाव के बाद पार्टी संगठन को जिलों में मजबूत करने की जिम्मेदारी मुकुल रॉय ने संभाली। विभिन्न दलों से नेताओं को तृणमूल में शामिल कराने और नए राजनीतिक समीकरण गढ़ने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। उन्हें बंगाल की राजनीति का ‘चाणक्य’ भी कहा जाने लगा, क्योंकि वे रणनीति बनाने और उसे अमल में लाने में दक्ष माने जाते थे।

ममता से विवाद और दूरीः मुकुल रॉय का राजनीतिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा। उनका नाम शारदा चिटफंड मामले और नारद प्रकरण में भी सामने आया। इन मामलों ने उनकी छवि पर असर डाला और पार्टी नेतृत्व के साथ उनके संबंधों में भी खटास आने लगी। इसके बाद एक दौर में ममता बनर्जी को राजनीति में मजबूत बनाने वाले मुकुल राय से दूरी बनाकर तृणमूल कांग्रेस में ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को अधिक अहमियत दी जाने लगी जो मुकुल रॉय को रास नहीं आया। इसे वह सह नहीं पाए और लगातार पार्टी से दूर होते गए। वर्ष 2017 तक तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से उनकी दूरी स्पष्ट होने लगी। नवंबर 2017 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। यह कदम पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव माना गया।

भारतीय जनता पार्टी में नई भूमिकाः भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद मुकुल रॉय को राज्य में संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई। पार्टी नेतृत्व ने उन्हें तृणमूल के कई नेताओं को अपने साथ लाने और संगठन विस्तार की रणनीति तैयार करने का दायित्व सौंपा। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 सीटें जीतकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। इस सफलता में मुकुल रॉय की रणनीतिक भूमिका को भी रेखांकित किया गया। वर्ष 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वे कृष्णानगर उत्तर सीट से विधायक निर्वाचित हुए। हालांकि कुछ ही महीनों बाद उन्होंने फिर तृणमूल कांग्रेस में वापसी कर ली। इस दलबदल को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ और अंततः दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें विधायक पद से अयोग्य ठहरा दिया गया।

महत्वपूर्ण भूमिकाः तृणमूल कांग्रेस में लौटने के बावजूद पार्टी में मुकुल रॉय की अहमियत पहले जैसी नहीं रही। स्वास्थ्य समस्याओं के कारण वे सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूर होते गए। लंबे समय से वे विभिन्न बीमारियों से जूझ रहे थे और पिछले दिनों कोमा में चले गए थे मुकुल रॉय का राजनीतिक जीवन उतार-चढ़ाव, रणनीति, महत्वाकांक्षा और बदलते समीकरणों की कहानी रहा। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने सत्ता के गलियारों में चुपचाप काम करते हुए राजनीति की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंगाल की समकालीन राजनीति मैं मुकुल राय की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर

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