इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की जांच रिपोर्ट हुई ऑनलाइन, खुली लापरवाही की परतें
- भागीरथपुरा में दूषित पानी से सैकड़ों लोग हुए थे, 36 की हो चुकी है मौत
इंदौर, 30 सितम्बर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर शहर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से बीमारी और मौतों के मामले में एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट ने व्यवस्था की लंबी चूक को उजागर किया है। बुधवार को मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ की वेबसाइट पर अपलोड हुई रिपोर्ट ने लापरवारी की परतें खोलकर रखी दी हैं।
इंदौर के भागीरथपुरा में दिसंबर 2025 में दूषित पानी पीने से बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए थे। इनमें से 36 लोगों की जानें चली गईं। मामले की जांच के एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार दूषित पानी की घटना कई दशकों में अलग-अलग स्तरों पर हुई तकनीकी, प्रशासनिक और निगरानी संबंधी विफलताओं का सामूहिक परिणाम थी।
रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथपुरा में दूषित पानी नलों में आने और लोगों के बीमार होने की जानकारी अफसरों और जनप्रतिनिधियों को फरवरी 2024 में ही मिल गई थी। रिपोर्ट में तत्काल कारण सीवरेज का दूषित पानी पेयजल पाइपलाइन में पहुंचना और मूल कारण सीवरेज नेटवर्क की गलत प्लानिंग व निर्माण को माना गया है।
आयोग ने 1990-95 के दौरान सीवरेज प्रोजेक्ट और 1999-2004 के दौरान वाटर सप्लाई पाइपलाइन बिछाने वाले तत्कालीन अधिकारियों, इंजीनियरों और तकनीकी अमले की भूमिका पर जिम्मेदारी तय की है। इसके अलावा बाद के वर्षों में इन लाइनों की जांच, मेंटेनेंस, मॉनिटरिंग और खराब पाइपों को समय पर बदलने में नाकाम रहे नगर निगम के इंजीनियरिंग अमले को भी जिम्मेदार माना है।
जांच रिपोर्ट में सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव की स्पष्ट जिम्मेदारी तय की है। तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त संदीप सोनी, तत्कालीन इंचार्ज असिस्टेंट इंजीनियर सरोज कुमार प्रजापति के अलावा प्रज्ञा तिवारी और नीति चौरसिया खरे को जिम्मेदार माना है।
रिपोर्ट में यह भी कहा है कि टेंडर की अंतिम स्वीकृति की शक्ति तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त रोहित सिसोनिया के पास थी। उस अवधि की जिम्मेदारी उनकी भूमिका के अनुसार तय करने की बात आयोग ने कही है।
आयोग के अनुसार- भागीरथपुरा में कई स्थानों पर सीवरेज और पेयजल पाइपलाइन को निर्धारित तकनीकी मानकों के मुताबिक अलग-अलग दूरी पर नहीं रखा गया था। कुछ जगह दोनों पाइपलाइनें समानांतर या एक-दूसरे को क्रॉस करती मिलीं। इससे पाइपलाइन में लीकेज या खराबी होने पर सीवरेज का पानी पेयजल लाइन में जाने का खतरा पैदा हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि तत्काल कारण सीवरेज का पानी पेयजल वितरण सिस्टम में पहुंचना था, जबकि इसका मूल कारण सीवरेज नेटवर्क की गलत प्लानिंग और निर्माण था।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह संकट किसी एक अधिकारी की गलती से पैदा नहीं हुआ, बल्कि करीब तीन दशक में सीवर और जलापूर्ति व्यवस्था से जुड़ी कई खामियां, निगरानी की कमी, शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई न होना और पाइपलाइन बदलने में हुई लंबी देरी धीरे-धीरे जमा होती गईं। इसके बावजूद अफसर नहीं जागे और घटना को हल्के में लिया।
उच्च न्यायालय के निर्देश पर कोर्ट की वेबसाइट पर ऑनलाइन की गई भागीरथपुरा मामले की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि वर्ष 2024 से ही बस्ती में पथरी, पेट दर्द, पीलिया और टाइफाइड के मरीज आने लगे थे। क्षेत्रीय पार्षद कमल वाघेला ने जांच आयोग को दिए अपने लिखित बयान में इसका खुलासा किया। उन्होंने अपने बयान में लिखा था कि दूषित पानी नलों में आने का मामला मैंने महापौर पुष्यमित्र भार्गव और जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया था। इसके बाद महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अफसरों को लाइन बदलने के निर्देश भी दिए थे। इसके बाद टेंडर जारी कर लाइन बदलने का काम भी शुरू हो गया था, लेकिन अक्टूबर 2025 में मरीज अचानक बढ़ने लगे।
पार्षद ने अपने बयान में यह भी कहा कि जब वे वर्ष 2023 में पार्षद बने, तब से ही भागीरथपुरा में दूषित पानी की समस्या आ रही है।आपको बता दें कि दूषित पानी के कारण बस्ती के 36 लोगों की मौत हुई। लंबे समय तक दूषित पानी के सेवन से लोगों के लीवर और किडनी फेल हो गए थे।
गौरतलब है कि इंदौर के भागीरथपुरा में पिछले साल दिसंबर में दो हजार से ज्यादा लोग बीमार हुए थे और 600 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हुए थे। यह मामला दिल्ली तक चर्चित हुआ था और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी भागीरथपुरा जाकर मृतकों के परिजनों से मिले थे। प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये का मुआवजा दिया है।
-----------------------
हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

