मप्र में फर्जी पासपोर्ट का बड़ा खेल, एक फोन पर क्लियर होते थे आवेदन, 12 अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध

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मप्र में फर्जी पासपोर्ट का बड़ा खेल, एक फोन पर क्लियर होते थे आवेदन, 12 अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध


ग्वालियर/भोपाल, 14 सितम्बर (हि.स.)। मध्य प्रदेश में बांग्लादेशी नागरिकों के फर्जी भारतीय दस्तावेज और पासपोर्ट तैयार कराने वाले अंतरराज्यीय नेटवर्क की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे नए खुलासे सामने आ रहे हैं। स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की पड़ताल में भोपाल, ग्वालियर, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और बैतूल से जुड़े 12 पुलिस अधिकारियों और अन्य विभागों के कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध मिली है। सभी जांच के दायरे में हैं और उनसे पूछताछ की तैयारी है।

एसटीएफ जांच में सामने आया है कि यह नेटवर्क वर्ष 2021 में ग्वालियर के डबरा से सक्रिय हुआ था और बाद में भोपाल समेत कई शहरों तक फैल गया। अकेले भोपाल के गोविंदपुरा क्षेत्र के अन्ना नगर स्थित एक मठ के पते का इस्तेमाल कर करीब 40 पासपोर्ट के आवेदन तैयार किए गए। वहीं डबरा के एक बुद्ध विहार के पते से 17 बांग्लादेशी नागरिकों के भारतीय दस्तावेज और पासपोर्ट बनाए गए। इस तरह इन दोनों ठिकानों से ही 57 संदिग्ध पासपोर्ट सामने आए हैं। चार जिलों में अब तक 70 से ज्यादा संदिग्ध पासपोर्ट मिलने की बात सामने आई है और एसटीएफ को आशंका है कि प्रदेश में इनकी संख्या 100 के पार जा सकती है।

सबसे चौंकाने वाली बात डबरा से सामने आई है। एसटीएफ जांच के मुताबिक संदिग्ध पासपोर्ट आवेदन थाने में वेरिफिकेशन के लिए पहुंचने से पहले ही वहां फोन आ जाता था। फोन करने वाला आवेदन को अर्जेंट बताते हुए उसे जल्द क्लियर करने के लिए कहता था। इसके बाद सत्यापन की प्रक्रिया तेजी से पूरी कर दी जाती थी। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि थाने में पहले से सूचना किसे और कैसे मिलती थी।

वर्ष 2021 में जब डबरा से ये पासपोर्ट सत्यापित हुए, उस दौरान विनायक शुक्ला थाना प्रभारी थे, जो वर्तमान में दतिया में डीएसपी हैं। पासपोर्ट वेरिफिकेशन सेल की जिम्मेदारी प्रधान आरक्षक भूपेंद्र गुर्जर के पास थी। कुछ समय के लिए सुरेंद्र सिंह भी थाना प्रभारी रहे। एसटीएफ इन अधिकारियों से पूछताछ कर यह जानना चाहती है कि संदिग्ध आवेदनों की जानकारी फोन करने वाले तक कैसे पहुंचती थी।

जांच में यह भी सामने आया कि 17 संदिग्ध पासपोर्ट में एक ही गवाह, एक ही पता और एक ही मोबाइल नंबर का इस्तेमाल हुआ। इतने स्पष्ट समानताओं के बावजूद सत्यापन के दौरान मामला पकड़ में नहीं आना पुलिस व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े करता है।

रैकेट के मुख्य आरोपित रियाल चौधरी को लेकर भी जांच में अहम जानकारी मिली है। पूछताछ में पता चला कि उसके नाम से चार अलग-अलग पासपोर्ट बने थे और इन सभी में फर्जी दस्तावेज लगाए गए थे। आरोप है कि उसने डबरा के दो स्थानीय दलालों की मदद से ये दस्तावेज तैयार करवाए। इस मामले में रियाल चौधरी, जाय चौधरी बरुआ, महाराष्ट्र के उल्हासनगर से पकड़े गए प्रियान राय और साउथ दिल्ली से गिरफ्तार विप्लव अधिकारी समेत चार आरोपितों की गिरफ्तारी हो चुकी है। आठ अन्य आरोपितों की तलाश जारी है।

फर्जी पहचान तैयार करने का तरीका भी जांच में सामने आया है। गिरोह कथित तौर पर पहले फर्जी आधार कार्ड तैयार करता था। इसके आधार पर पैन कार्ड और नगर निगम से जन्म प्रमाण पत्र बनवाए जाते थे। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट के लिए आवेदन किया जाता था। खुद को बौद्ध अनुयायी बताकर कुछ बांग्लादेशी नागरिकों ने भारतीय पहचान हासिल की और बाद में थाईलैंड, मलेशिया, चीन, श्रीलंका और जापान तक की यात्राएं भी कीं। एजेंसियां अब इन यात्राओं के वास्तविक उद्देश्य और संभावित अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की पड़ताल कर रही है।

डबरा के जिस बुद्ध विहार के पते से 17 पासपोर्ट बने, वहां दस्तावेजों को लेकर भी कई सवाल सामने आए हैं। संबंधित भिक्षु का नाम अलग-अलग रिकॉर्ड में अलग है। आधार कार्ड में नाम रामेश्वर जाटव दर्ज है, जबकि वोटर आईडी में भंते संघप्रिय और मठ की दीवार पर रांघप्रिय महाथेरो लिखा है। आधार में पिता का नाम नारायण जाटव और पता दतिया का दर्ज है। उसका कहना है कि उसने कुछ दिन पहले बौद्ध धर्म अपनाया और इसके बाद नाम संघप्रिय रखा।

एसटीएफ को जांच के दौरान मठ से जुड़े रिकॉर्ड भी व्यवस्थित नहीं मिले। वहां आने-जाने वाले लोगों का कोई पूरा विवरण उपलब्ध नहीं है। कौन व्यक्ति कब आया, कहां से आया, कितने समय रुका और कब गया, इसका रिकॉर्ड नहीं मिला। इसी वजह से मठों की भूमिका को भी जांच के दायरे में रखा गया है।

इस पूरे मामले का दायरा सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं दिख रहा। विदेश मंत्रालय ने वर्ष 2023 में ही मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय को फर्जी पासपोर्ट बनाए जाने के संबंध में रिपोर्ट भेजकर आगाह किया था। इसके बावजूद ठोस स्तर पर कार्रवाई या व्यापक चेतावनी जारी नहीं होने से सवाल उठ रहे हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय की इमिग्रेशन ब्रांच ने देशभर के एयरपोर्ट और बंदरगाहों पर हाई अलर्ट जारी किया है। एजेंसियों को आशंका है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बनाए गए पासपोर्ट इस्तेमाल कर कुछ लोग विदेश यात्रा कर चुके हैं या आगे भी सीमा पार करने की कोशिश कर सकते हैं।

एसटीएफ एसपी राजेश सिंह भदौरिया ने सोमवार को बताया कि मामले की तह तक पहुंचने के लिए पांच टीमें प्रदेश के बाहर भेजी गई हैं। पांच साल की अवधि में फर्जी दस्तावेज तैयार करने से लेकर पासपोर्ट सत्यापन तक जिन पुलिस थानों और विभागों से फाइलें गुजरीं, वहां के अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची तैयार की गई है। कई संदिग्धों के दो से तीन दस्तावेज भी मिले हैं। अब जांच का फोकस नेटवर्क के स्थानीय मददगारों के साथ-साथ उन लोगों पर भी है, जिन्होंने सरकारी सत्यापन व्यवस्था को पार कराने में मदद की।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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