भोजशाला मामले में मुस्लिम पक्ष ने एएसआई सर्वे पर उठाए सवाल, कहा- कार्बन डेटिंग नहीं हुई

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भोजशाला मामले में मुस्लिम पक्ष ने एएसआई सर्वे पर उठाए सवाल, कहा- कार्बन डेटिंग नहीं हुई


भोजशाला मामले में मुस्लिम पक्ष ने एएसआई सर्वे पर उठाए सवाल, कहा- कार्बन डेटिंग नहीं हुई


इंदौर, 11 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में चल रही नियमित सुनवाई के दौरान सोमवार को मस्जिद पक्ष ने प्रतिउत्तर प्रस्तुत करते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सर्वे पर ही सवाल खड़े कर दिए। कहा गया कि जब सर्वे के दौरान मिली शिलाओं, मूर्तियों और अन्य सामग्री की कार्बन डेटिंग ही नहीं की गई तो एएसआई को कैसे पता चला कि भोजशाला का निर्माण परमारकाल में हुआ था।

भोजशाला मामले में मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में सोमवार को सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन और उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पक्ष रखा, जबकि अधिवक्ता तौसिफ वारसी कोर्ट में उपस्थित रहे।

वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने मस्जिद पक्ष की ओर से कहा कि सर्वे के दौरान मिली शिलाओं, मूर्तियों और अन्य सामग्री की कार्बन डेटिंग ही नहीं की गई। जब कार्बन डेटिंग ही नहीं हुई तो एएसआई को कैसे पता चला कि भोजशाला का निर्माण परमारकाल में हुआ था। वर्ष 2003 से भोजशाला एएसआई के अधिपत्य में है। इस बात की आशंका को नकारा नहीं जा सकता कि सर्वे से पहले कुछ वस्तुएं भोजशाला में प्रतिस्थापित कर दी गई हों।

उन्होंने कहा कि कोर्ट ने एएसआई को निर्देश दिए थे कि सर्वे के दौरान भोजशाला में किसी तरह का भौतिक बदलाव नहीं किया जाएगा, बावजूद इसके सर्वे में दो ओटले हटा दिए गए। एएसआई ने एक ही समय में अलग-अलग स्थानों पर सर्वे किया। ऐसे में मस्जिद पक्ष की ओर से उपस्थित दो लोगों के लिए हर जगह मौजूद होना संभव नहीं था।

वहीं, अपीलार्थी काजी जकुल्ला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने तर्क रखे। उन्होंने कहा कि अभी यह तय नहीं हुआ है कि भोजशाला मंदिर है, मस्जिद है या जैन शाला। उन्होंने कहा कि यदि यह मंदिर होता तो वहां मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा होती, जबकि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। भोजशाला को मंदिर बताने वाले खुद असमंजस में हैं। उन्हें नहीं पता कि वे क्या सिद्ध करना चाहते हैं। कभी भोजशाला को मंदिर बताते हैं तो कभी पाठशाला। उनके पास अपनी बात सिद्ध करने के लिए कुछ नहीं है। तर्क दिया कि विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है, जबकि हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा जनहित याचिका के माध्यम से स्वयं को समाजसेवी बताना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

अधिवक्ता शोभा मेनन ने कहा कि वर्ष 1904 से 28 नवंबर 1951 के बीच की कोई अधिसूचना नहीं है। इस समयावधि में एएसआई को भोजशाला में कुछ करने का अधिकार ही नहीं था। 24 अगस्त 1935 को धार दरबार ने ऐलान की घोषणा की थी। एएसआई ने वर्ष 2003 में दिए आदेश में शुक्रवार को दोपहर एक से तीन के बीच नमाज की अनुमति दी थी, क्योंकि एएसआई को पता था कि धार दरबार का आदेश अस्तित्व में है।

सलमान खुर्शीद ने ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है, जो सिद्ध कर सके कि भोजशाला मंदिर है। मंदिर पक्ष ने स्वामित्व को लेकर कोई राहत नहीं मांगी है। मंदिर पक्ष एक भी साक्ष्य ऐसा प्रस्तुत नहीं कर सका जो सिद्ध करे कि भोजशाला को तोड़कर मस्जिद बनाया गया हो। सर्वे बताता है कि विवादित स्थान के बीच में एक टैंक बना है। दरअसल, यह वजूखाना है। इससे पानी की निकासी की व्यवस्था भी है। वीडियोग्राफी में दिख रहा है कि अखबार, प्लास्टिक, कप आदि मिले हैं। यह संभव नहीं कि ये चीजें सदियों से वहां पड़ी हों। सर्वे के दौरान गौतम बुद्ध की एक मूर्ति भी मिली थी, लेकिन एएसआई की रिपोर्ट में इसका उल्लेख तक नहीं है।

रिपोर्ट में गौतम बुद्ध की प्रतिमा का नहीं है उल्लेख

आरोप लगाया कि सर्वे की सूचना मुस्लिम पक्ष को औपचारिक रूप से नहीं दी गई और जानकारी केवल सोशल मीडिया के माध्यम से मिली। खुर्शीद ने कहा कि सर्वे एक साथ कई स्थानों पर किया गया, जिससे सभी स्थानों पर पक्षकारों की मौजूदगी संभव नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि सर्वे के दौरान गौतम बुद्ध की प्रतिमा मिली थी, लेकिन उसका उल्लेख रिपोर्ट में नहीं किया गया। साथ ही सर्वे में कार्बन डेटिंग तकनीक का उपयोग नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाए गए।

सर्वे प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

एडवोकेट तौसिफ वारसी ने कहा कि सर्वे के दौरान पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर की मौजूदगी के लिए कोई स्पष्ट न्यायालयीन आदेश नहीं था, फिर भी वे पूरे समय उपस्थित रहे उन्होंने यह भी कहा कि सर्वे आधुनिक तकनीक से किया जाना था, लेकिन सर्वे टीम ने पुरानी तकनीक “टोटल स्टेशन” का इस्तेमाल किया।

सोमवार को मस्जिद पक्ष के अलावा अपीलार्थी काजी जकुल्ला की ओर से भी प्रतिउत्तर पूरे हो गए। अब मंगलवार को कोर्ट अन्य पक्षकारों को सुनेगी, जिसके बाद कोर्ट अपना निर्णय सुरक्षित रख सकती है। कोर्ट ने सभी पक्षकारों से कहा है कि वे मंगलवार को अपने तर्क पूरे कर लें।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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