भोजशाला मामले में हाई कोर्ट ने दिए एएसआई सर्वे की वीडियोग्राफी मस्जिद पक्ष को सौंपने के निर्देश

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भोजशाला मामले में हाई कोर्ट ने दिए एएसआई सर्वे की वीडियोग्राफी मस्जिद पक्ष को सौंपने के निर्देश


भोजशाला मामले में हाई कोर्ट ने दिए एएसआई सर्वे की वीडियोग्राफी मस्जिद पक्ष को सौंपने के निर्देश


इंदौर, 21 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर विवाद मामले में मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने अहम आदेश देते हुए 98 दिन तक चले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) सर्वे की वीडियोग्राफी दोनों पक्षों को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने एएसआई से कहा है कि वह 27 अप्रैल से पहले पूरी रिकॉर्डिंग गूगल ड्राइव पर अपलोड करे और उसका पासवर्ड कोर्ट व मौलाना कलामुद्दीन वेलफेयर सोसायटी (मस्जिद पक्ष) को सौंपे।

ऐतिहासिक भोजशाला परिसर विवाद मामले में मंगलवार को मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने नियमित सुनवाई की। इस दौरान रेस ज्यूडीकेटा और याचिकाओं की मेंटेनबिलिटी के मुद्दों पर विस्तृत बहस हुई। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए और तर्क रखे।

अधिवक्ता नूर अहमद शेख बताया कि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से की ओर से एडवोकेट खुर्शीद ने दलीलें पेश कीं। बहस के दौरान जवाब और सिनॉप्सिस के साथ विभिन्न न्यायिक निर्णयों का हवाला दिया गया। एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर तर्क रखे।

याचिका की मेंटेनबिलिटी मुद्दा उठाया गया कि इस प्रकार के विषयों का निर्णय रिट क्षेत्राधिकार में नहीं किया जा सकता। रेस ज्यूडीकेटा के सिद्धांत पर दलील दी गई कि समान राहत की मांग वाली कई याचिकाएं पहले ही निर्णयित हो चुकी हैं, जिनमें 7 अप्रैल 2003 के आदेश को चुनौती दी गई थी। बताया गया कि पूर्व में दायर याचिकाओं में से कुछ पर हाई कोर्ट द्वारा निर्णय दिया जा चुका है और उनसे संबंधित रिट अपील पेंडिंग है। ऐसे में समान प्रकृति की याचिकाओं पर पुनः सुनवाई रेस ज्यूडीकेटा के सिद्धांत के तहत बाधित हो सकती है। हालांकि, प्रतिपक्ष ने यह भी तर्क रखा कि इस मामले में रेस ज्यूडीकेटा लागू नहीं होता।

आगे की सुनवाई में ऐतिहासिक पहलुओं पर बहस

एडवोकेट शेख ने बताया कि अगली सुनवाई में ऐतिहासिक पहलुओं पर विस्तार से तर्क प्रस्तुत किए जाएंगे। साथ ही, अयोध्या से संबंधित निर्णय का भी उल्लेख किया गया है, जिस पर आगे बहस होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि अभी कई पक्षकारों की दलीलें शेष हैं, जिनमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और शासन की ओर से प्रस्तुतियां शामिल हैं। मामले की सुनवाई जारी है।

इधर, कोर्ट ऑर्डर के अनुसार कमाल मौलाना वेलफेयर सोसायटी की ओर से सलमान खुर्शीद ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह विवाद मूल रूप से स्वामित्व का है, जिसे रिट याचिका के जरिए नहीं सुलझाया जा सकता। उन्होंने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका को गैर-प्रासंगिक बताते हुए निरस्त करने की मांग की। साथ ही यह भी तर्क दिया कि मामला पहले से जिला अदालत में लंबित है, ऐसे में सीधे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करना न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

खुर्शीद ने अदालत को बताया कि उनका वीडियोग्राफी प्रस्तुत करने संबंधी आवेदन ( आईए क्रमांक 2318/26 ) विचाराधीन है, जिस पर उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा एक अप्रैल 2026 को पारित आदेश में यह निर्देश दिए थे कि यदि वीडियोग्राफी में दर्ज तथ्यों के आधार पर कोई आपत्तियां होती हैं, तो उच्च न्यायालय उन आपत्तियों को भी अन्य आपत्तियों के साथ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार विचार करेगा। अतः एएसआई द्वारा किए गए सर्वेक्षण की वीडियोग्राफी उन्हें उपलब्ध कराई जाए, ताकि उसे देखकर वे अपनी आपत्तियां प्रस्तुत कर सकें। एएसआई की ओर से सुनील जैन ने आपत्ति लेते हुए कहा कि 98 दिनों के सर्वे की वीडियोग्राफी उपलब्ध कराने में काफी समय लगेगा। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार वीडियोग्राफी केवल कोर्ट द्वारा देखने तक ही सीमित है।

एएसआई 27 अप्रैल तक उपलब्ध कराएं वीडियोग्राफी

एएसआई के तर्क को अमान्य करते हुए उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए एएसआई को यह निर्देशित किया कि चूंकि भोजशाला मामले की सुनवाई प्रतिदिन चल रही अतः भोजशाला सर्वे की वीडियोग्राफी को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म गूगल ड्राइव या क्लाउड सेवा पर 27 अप्रैल तक प्राथमिकता के आधार पर अपलोड कर याचिकाकर्ता को प्रदान की जाए। बुधवार को एडवोकेट फिर इस मुद्दे पर बहस करेंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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