भोजशाला विवाद मामले में एएसआई का दावा- मंदिर से निकाली सामग्री से बनी मस्जिद

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भोजशाला विवाद मामले में एएसआई का दावा- मंदिर से निकाली सामग्री से बनी मस्जिद


- हाई कोर्ट ने खारिज की सर्वे अधिकारियों के क्रॉस एग्जामिनेशन की मांग, वीडियोग्राफी देखने की व्यवस्था के निर्देश

इंदौर, 04 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में चल रही नियमित सुनवाई के दौरान सोमवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने दावा किया ऐतिहासिक भोजशाला में मस्जिद का निर्माण वहां स्थित मंदिर से निकाली गई सामग्री से ही किया गया था। यही कारण है कि यहां पत्थरों पर संस्कृत में लिखे श्लोक मिले हैं।

भोजशाला मामले में मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में सोमवार को हुई अहम सुनवाई करीब दो घंटे तक चली। इस सर्वे अधिकारियों के क्रॉस एग्जामिनेशन की मांग को उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। यह निर्णय हिंदू पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन की आपत्ति के बाद लिया गया।

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका में प्रतिवादी 8 (मौलाना कमालमौला वेलफेयर सोसायटी) की ओर से सर्वे अधिकारियों के क्रॉस एग्जामिनेशन की अनुमति मांगी गई थी। इस पर हिंदू पक्ष के अधिवक्ता जैन ने आपत्ति जताते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय के 1 अप्रैल 2026 के आदेश और पूर्व में 21 अप्रैल 2026 के आदेश में ऐसी अनुमति नहीं दी गई है। तर्कों से सहमत होते हुए उच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष का आवेदन निरस्त कर दिया।

उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान एएसआई की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन ने सर्वे के समर्थन में तर्क रखे। उन्होंने मस्जिद पक्ष की ओर से उठाई गईं आपत्तियों का बिंदुवार जवाब दिया। मस्जिद पक्ष के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि धार दरबार ने वर्ष 1935 में एक अधिसूचना जारी कर इसे मस्जिद बताया था, लेकिन अधिनियम के प्रावधान से स्पष्ट है कि धार दरबार को अधिसूचना जारी करने का अधिकार ही नहीं था। उन्होंने भोजशाला को लेकर तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों के बीच हुए पत्राचार का संदर्भ भी दिया। अदालत को बताया गया कि तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी भोजशाला को लेकर सजग थे और इसके रखरखाव को लेकर बहुत चिंता करते थे। उन्होंने इस संबंध में 13 जुलाई 1935 के दस्तावेजों का हवाला भी दिया।

अधिवक्ता जैन ने कहा कि वर्ष 1904 से ही भोजशाला राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर घोषित है और एएसआई भोजशाला का स्वामी नहीं, बल्कि अभिभावक है। उसने समय-समय पर इसका रखरखाव भी किया। वर्ष 1935 में भोजशाला के रखरखाव पर 50 हजार रुपये खर्च किए गए थे। एएसआई की ओर से मंगलवार को भी तर्क रखे जाएंगे।

वीडियोग्राफी एक्सेस को लेकर उठे सवाल

सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता तौसीफ वारसी ने कहा कि न्यायालय के आदेश के बावजूद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा सर्वे की वीडियोग्राफी उपलब्ध नहीं कराई गई है। इस पर एएसआई ने अदालत को बताया कि पूरी वीडियोग्राफी गूगल ड्राइव के माध्यम से उपलब्ध करा दी गई है। इस पर मुसिल्म पक्ष ने कहा कि गूगल ड्राइव पर फाइलें इतनी बड़ी हैं कि इसे देख पाना संभव नहीं है। इस पर अदालत ने मस्जिद पक्ष के वकील से कहा कि वह चाहें तो कोर्ट चैंबर में आईटी विभाग की मदद लेकर फाइलें देख सकते हैं।

अदालत ने अपने आईटी सेक्शन को निर्देश दिए कि प्रतिवादी पक्ष के एडवोकेट को उसी दिन वीडियोग्राफी देखने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। अदालत ने प्रतिवादी के वकीलों को 7 मई 2026 तक वीडियोग्राफी पर अपनी लिखित आपत्तियां प्रस्तुत करने की अनुमति दी है। मामले की अगली सुनवाई 5 मई को होगी, जिसमें एएसआई की ओर से एडवोकेट सुनील जैन, सलेकचंद जैन और दिनेश राजभर कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखेंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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