ऐतिहासिक भोजशाला मामले में महाधिवक्ता ने रखा सरकार का पक्ष, खारिज किए मस्जिद पक्ष के तर्क

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ऐतिहासिक भोजशाला मामले में महाधिवक्ता ने रखा सरकार का पक्ष, खारिज किए मस्जिद पक्ष के तर्क


- जैन पक्ष ने भोजशाला के जैन गुरुकुल होने के दावे को दोहराया

इंदौर, 07 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में चल रही नियमित सुनवाई के दौरान गुरुवार को एएसआई की रिपोर्ट बहस का केन्द्र रही। इस दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने शासन का पक्ष रखते हुए मस्जिद पक्ष के तर्कों को खारिज कर दिया। वहीं जैन पक्ष ने भोजशाला के जैन होने के दावे को दोहराया।

भोजशाला मामले में मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने अपने तर्क रखे। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की सर्वे रिपोर्ट के विभिन्न अंशों का हवाला देते हुए कहा कि रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य और निष्कर्ष दर्ज हैं, जो यह संकेत देते हैं कि विवादित स्थल पूर्व में सरस्वती मंदिर था।

यह सुनवाई हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका पर हुई। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कहा कि ‘धार दरबार ऐलान’ को अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता। उन्होंने इस मुद्दे पर भी विस्तार से पक्ष रखा और कहा कि मस्जिद पक्ष ने धार दरबार द्वारा वर्ष 1935 में जारी अधिसूचना को लेकर कोर्ट में अधूरी और भ्रामक जानकारी दी है। इस बिंदु को पूर्व में सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद, तौसिफ वारसी और शोभा मेनन द्वारा उठाया गया था। मस्जिद पक्ष ने कोर्ट को यह नहीं बताया कि धार दरबार ने किन परिस्थितियों में भोजशाला को मस्जिद बताया था। उच्चतम न्यायालय भी कहता है कि संविधान की कसौटी पर जांचे बगैर किसी राज (धार) दरबार द्वारा स्वतंत्रता के पूर्व जारी किसी अधिसूचना को जस का तस कानून के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

महाधिवक्ता ने कहा कि “धार दरबार ऐलान” को अलग रूप से पढ़कर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि स्वयं धार दरबार के प्रमुख वी. नाडकर ने पूरी कार्यवाही के दौरान यह स्वीकार किया था कि उक्त स्थल पूर्व में सरस्वती मंदिर था। उन्होंने कहा कि केवल इस कथन के आधार पर कि “यहां नमाज होती आई है, होती है और आगे भी होती रहेगी”, किसी दस्तावेज को निर्णायक नहीं माना जा सकता। इस कथन को ऐतिहासिक और विधिक संदर्भ में समग्र रूप से देखना आवश्यक है।

‘धार दरबार ऐलान’ को कानून का दर्जा नहीं

महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 वर्ष 1937 में लागू हुआ था इसलिए उससे पहले जारी किसी कथित “धार दरबार ऐलान” को इस अधिनियम के आधार पर वैधानिक मान्यता नहीं दी जा सकती। उन्होंने दलील दी कि किसी दस्तावेज या प्रावधान को “कानून” का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसका विधायी प्रक्रिया से पारित होना आवश्यक है। जबकि “धार दरबार ऐलान” की प्रकृति ही स्पष्ट नहीं है कि वह प्रशासनिक, कार्यपालिका संबंधी या विधायी दस्तावेज था। ऐसी स्थिति में उक्त दस्तावेज को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत “विधि” नहीं माना जा सकता।

उन्होंने भारत शासन अधिनियम 1935 की धारा 311(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि तथाकथित “धार दरबार ऐलान” को वैधानिक रूप से कानून का दर्जा नहीं दिया जा सकता। महाधिवक्ता ने दोहराया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सर्वे में भोजशाला में जो मूर्तियां मिली हैं, वे बता रही हैं कि भोजशाला मंदिर ही है। शोभा मेनन ने धार दरबार के आदेश की अधूरी कहानी बताई। सच्चाई यह है कि भोजशाला पहले सरस्वती मंदिर और शिक्षा का केंद्र थी।

सुनवाई के दौरान सलेकचंद जैन द्वारा दायर याचिका में एडवोकेट दीपक राजभर (दिल्ली) ने भी कोर्ट के समक्ष पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट से सर्वे की वीडियोग्राफी उपलब्ध कराने की मांग की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। उन्होंने माउंट आबू के जैन मंदिरों का हवाला देते हुए कहा कि वहां के मंदिरों की बनावट भोजशाला जैसी है। कोर्ट ने उनसे कहा कि आप स्पष्ट करें कि आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं। उन्होंने दावा दोहराया किया कि भोजशाला पूर्व में जैन गुरुकुल था और वहां जैन देवी अंबिका का मंदिर स्थित था।

मामले में हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों की ओर से लगातार ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरातात्विक रिपोर्टों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर दलीलें दी जा रही हैं। कोर्ट में अब “धार दरबार ऐलान”, एएसआई रिपोर्ट और ऐतिहासिक अभिलेखों की वैधानिक स्थिति पर बहस केंद्रित हो गई है। अदालत शुक्रवार से वादियों और प्रतिवादियों के प्रति उत्तर को लेकर सुनवाई करेगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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