दुनिया की चुनौतियों का समाधान भारत की ज्ञान परंपरा में निहित है : डॉ. मोहन भागवत

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मुंबई, 02 अक्टूबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शुक्रवार को मुंबई में कहा कि आज दुनिया विभिन्न विरोधाभासों, संघर्षों और चरमपंथी विचारधाराओं के कारण अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। इन चुनौतियों का समाधान और मानवता का मार्गदर्शन करने की क्षमता भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में निहित है। इसी कारण आज दुनिया आशा की दृष्टि से भारत की ओर देख रही है।

डॉ. मोहन भागवत आज बोरीवली में आयोजित ‘ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप’ के 14वें अधिवेशन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत में राष्ट्र और धर्म अलग नहीं हैं। राष्ट्र का प्रयोजन धर्म है और धर्म की धारणा के लिए राष्ट्र आवश्यक है। दोनों परस्परावलंबी हैं। राष्ट्र दुर्बल होगा तो धर्म संकट में आएगा और धर्माचरण कमजोर होगा तो राष्ट्र भी कमजोर होगा। इसलिए दोनों को सम्यक रूप से साथ लेकर चलना हमारा कर्तव्य है।

डॉ. भागवत ने कहा कि भारत ने अपने ज्ञान का प्रसार कभी आक्रमण या बलपूर्वक धर्मांतरण के माध्यम से नहीं किया, बल्कि मानव कल्याण की नि:स्वार्थ भावना से दुनिया के साथ अपनी ज्ञान परंपरा साझा की। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और भगवद्गीता के साथ जैन आगम, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब जैसे ग्रंथों में मानवता को दिशा देने वाला व्यापक ज्ञान समाहित है। उन्होंने कहा कि इस ज्ञान परंपरा का संरक्षण और उसे अगली पीढिय़ों तक पहुंचाना केवल धार्मिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के प्रति दायित्व है। संत परंपरा और सेवाभावी प्रवृत्ति को बढ़ावा देना मानव समाज के सुरक्षित और कल्याणकारी भविष्य को मजबूत करना है।

आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि महाराज ने कहा कि देश की संस्कृति समाप्त होने पर देश को नष्ट होने में समय नहीं लगता। इसलिए संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन आवश्यक है, जो संस्कारों के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र बचेगा तो धर्म बचेगा और धर्म बचेगा तो समाज सुरक्षित रहेगा।

‘ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप’ देशभर में पैदल विहार करने वाले जैन साधुओं की यात्राओं को सुरक्षित और दुर्घटनामुक्त बनाने में सहयोग करता है। इस अवसर पर आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि महाराज की 536वीं पुस्तक ‘आनंद यात्रा-अठारह कर्तव्य’ का विमोचन संघ प्रमुख डॉ. भागवत ने किया। आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि महाराज अब तक 500 से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं।

कार्यक्रम में आचार्य महाबोधि सूरीश्वर जी सहित अन्य आचार्य और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजबहादुर यादव

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