जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने कृषि भवन से कदीमी मस्जिद को हटाए जाने के प्रस्ताव का विरोध किया

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जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने कृषि भवन से कदीमी मस्जिद को हटाए जाने के प्रस्ताव का विरोध किया


जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने कृषि भवन से कदीमी मस्जिद को हटाए जाने के प्रस्ताव का विरोध किया


नई दिल्ली, 04 नवंबर (हि.स.)। जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने कृषि भवन से 'कदीमी मस्जिद' को हटाए जाने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा कि सरकार का यह दावा कि मस्जिद सार्वजनिक संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं है और इससे सरकार की पक्षपाती और सांप्रदायिक मानसिकता उजागर होती है।

मलिक मोतसिम खान ने बुधवार को एक बयान में कहा, सरकार का यह दावा कि एक सदी पुरानी मस्जिद सार्वजनिक संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं है, एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है- वह कौन सा नियम है जो सरकारी परिसरों में किसी भी धर्म के लोगों के लिए प्रार्थना की सुविधा पर रोक लगाता है? धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करना, न कि लंबे समय से स्थापित पूजा स्थल को हटाने के लिए इसका उपयोग करना। केंद्र को अपने रुख के पीछे का कानूनी आधार स्पष्ट करना चाहिए, यह बताना चाहिए कि मस्जिद के इतिहास और लंबे समय से हो रहे इसके इस्तेमाल को किस तरह मान्यता दी गयी है और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब तक मामला अदालत में है, तब तक कोई ऐसा कदम न उठाया जाए जिसे बाद में बदला न जा सके।

उन्होंने कहा कि 'कदीमी मस्जिद' कृषि भवन परिसर के बनने से पहले से मौजूद है। असल बात यह है कि सरकारी दफ्तर 'कदीमी मस्जिद' के आस-पास बनाए गए थे, न कि मस्जिद ने किसी पहले से मौजूद दफ्तर परिसर पर कब्जा किया था। वर्ष 1970 में मस्जिद के लिए जारी वक्फ अधिसूचना और 1940 का वह समझौता, जिसमें नमाज़ के लिए इसके इस्तेमाल को मान्यता दी गई थी- ये ऐसे मामले हैं जिन पर उचित रूप से विचार किया जाना चाहिए। सरकार इस इतिहास को महत्वहीन नहीं मान सकती और न ही किसी पुनर्विकास परियोजना के लिए मस्जिद के लंबे समय से चले आ रहे धार्मिक उपयोग को एकतरफा तरीके से खत्म कर सकती है।

खान ने कहा, दशकों से केंद्रीय सचिवालय के मुस्लिम कर्मचारी और आगंतुक इबादत के लिए इस नजदीकी इबादतगाह पर निर्भर रहे हैं। सरकार को यह मौलिक अधिकार छीनने का कोई हक नहीं है। क्या अन्य सार्वजनिक और सरकारी परिवेशों में भी धार्मिक प्रथाओं और प्रतीकों को जगह नहीं दी जा रही है? क्या यह सच नहीं है कि पूरे भारत में सार्वजनिक कार्यक्रमों, पुलिस थानों और सरकारी कार्यालयों में धार्मिक प्रथाओं, प्रतीकों, मूर्तियों और अनुष्ठानों (जैसे भूमि पूजन, हवन और धार्मिक स्थलों) को नियमित रूप से शामिल किया जाता है? सेंट्रल विस्टा का पुनर्विकास कानून के दायरे में होना चाहिए और इसमें मस्जिद का इस्तेमाल करने वालों के अधिकारों और चिंताओं का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।

खान के मुताबिक मस्जिद समिति ने स्पष्ट किया है कि वह इस परियोजना को रोकना नहीं चाहती है; बल्कि सरकार को अपने प्रस्तावित प्रोजेक्ट में इस मौजूदा प्रार्थना स्थल की सुरक्षा और उसे शामिल करने के लिए लचीलेपन का प्रदर्शन करना चाहिए। हम सरकार से आग्रह करते हैं कि वह न्याय के सभी मानदंडों का पालन करे।

हिन्दुस्थान समाचार/ मोहम्मद ओवैस

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Livevns.news Desk
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