'देवनीमोरी अवशेष' श्रीलंका के गंगारामया मंदिर में पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ स्थापित

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'देवनीमोरी अवशेष' श्रीलंका के गंगारामया मंदिर में पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ स्थापित




नई दिल्ली, 05 फरवरी (हि.स.)। भारत-श्रीलंका के बीच सदियों पुराने सभ्यतागत एवं आध्यात्मिक संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करते हुए, भगवान बुद्ध के पवित्र 'देवनीमोरी अवशेष' को प्रदर्शनी के लिए श्रीलंका की राजधानी कोलंबो ले जाया गया है। इन अवशेषों को वहां पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ मंदिर में स्थापित कर दिया गया है।

संस्कृति मंत्रालय के अनुसार इन अवशेषों को भारतीय वायु सेना के एक विशेष विमान से कोलंबो ले जाया गया, जहां इनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया गया। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी के नेतृत्व में एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल इन अवशेषों को लेकर बुधवार को श्रीलंका पहुंचा।

कोलंबो के गंगारामया मंदिर में श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने बुधवार को इस प्रदर्शनी का आधिकारिक उद्घाटन किया। इस अवसर पर गंगारामया मंदिर के मुख्य पुजारी, डॉ. किरिंदे असाजी थेरो, वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु और गणमान्य अधिकारी शामिल थे।

इस मौके पर गंगारामया मंदिर में पवित्र पिपरावा का अनावरण तथा समकालीन भारत के पवित्र अवशेष और सांस्कृतिक जुड़ाव शीर्षक से दो प्रदर्शनियों का भी उद्घाटन किया गया। यह प्रदर्शनी भारत के बाहर देवनीमोरी अवशेषों की पहली सार्वजनिक प्रदर्शनी है। इससे पहले, भारत ने श्रीलंका में कपिलवस्तु अवशेषों की प्रदर्शनी 2012 में और सारनाथ अवशेषों की प्रदर्शनी 2018 में आयोजित की थी। 5 फरवरी, 2026 से यह प्रदर्शनी आम जनता और दुनिया भर से आए श्रद्धालुओं के लिए खोल दी गई है।

यह आयोजन श्रीलंका के 78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हो रहा है, जो इसे और भी गौरवशाली बनाता है। यह भारत के बाहर देवनीमोरी अवशेषों की पहली सार्वजनिक प्रदर्शनी है, जो दोनों देशों के बीच अटूट भरोसे का प्रतीक है। यह प्रदर्शनी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अप्रैल 2025 में की गई घोषणा का परिणाम है। प्रधानमंत्री ने बौद्ध संबंधों को बढ़ावा देने के लिए पहले से घोषित 1.50 लाख अमेरिकी डॉलर के अनुदान के अलावा अनुराधापुरा में 'पवित्र नगर परिसर' के विकास के लिए अतिरिक्त सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई थी।

देवनीमोरी के पवित्र अवशेषों का प्रदर्शन भगवान बुद्ध की शाश्वत शिक्षाओं करुणा, शांति और अहिंसा का जीवंत प्रमाण है और भारत- श्रीलंका के बीच गहरे सभ्यतागत संबंधों को दर्शाता है, जिससे दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, आध्यात्मिक तथा जन-संबंध और भी मजबूत होते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

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