'युगवार्ता' और 'नवोत्थान' के विशेषांकों ने खोला विकसित भारत का वैचारिक द्वार

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'युगवार्ता' और 'नवोत्थान' के विशेषांकों ने खोला विकसित भारत का वैचारिक द्वार


- ‘भारतीय भाषाओं में एकता के सूत्र’ तथा दादा साहब आप्टे की पुस्तक का भी विमोचन

- भारतीय ज्ञान परंपरा और क्षेत्रीय भाषाओं को आधुनिक विमर्श से जोड़ने की पहल

- भाषाओं की विविधता में छिपी है ज्ञान की विराट शक्ति, 'युगवार्ता और 'नवोत्थान' पत्रिका के विशेषांक का लोकार्पण

वाराणसी, 13 सितम्बर (हि.स.)। भारतीय भाषाओं की विविधता में छिपी एकता और हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरा को आधुनिक भारत के विमर्श से जोड़ते हुए भारतीय भाषा समागम में महत्वपूर्ण प्रकाशनों का लोकार्पण किया गया। ‘युगवार्ता’ और ‘नवोत्थान’ के विशेषांकों के साथ ‘भारतीय भाषाओं में एकता के सूत्र’ तथा दादा साहब आप्टे की पुस्तक का भी विमोचन हुआ। एक मंच पर इन प्रकाशनों का लोकार्पण भारतीय भाषाओं को केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता और ज्ञान-संपदा की आधारशिला के रूप में देखने का संदेश बना। विमोचन डॉ. कुलदीप अग्निहोत्री पूर्व कुलपति हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, मुकुल कानिटकर अखिल भारतीय प्रचार टोली सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, डॉ. नीलकंठ तिवारी विधायक व पूर्व मंत्री, प्रो. वांगचुक दोरजी नेगी कुलपति केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान सारनाथ वाराणसी, पदुम नारायण द्विवेदी, राज्य सूचना आयुक्त और अरविन्द भालचंद्र मार्डीकर अध्यक्ष हिन्दुस्थान समाचार ने संयुक्त रूप से किया।

भाषाएं अलग, आत्मा एक

‘भारतीय भाषाओं में एकता के सूत्र’ प्रकाशन का केंद्र बिंदु यही विचार रहा कि भारत की भाषाई विविधता के पीछे एक गहरी सांस्कृतिक एकता विद्यमान है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भाषाएं भले अलग-अलग हों, लेकिन उनमें भारत की साझा सभ्यता, परंपरा और जीवन-दृष्टि की अनेक समान धाराएं दिखाई देती हैं। भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने और एक-दूसरे की ज्ञान परंपराओं को समझने से यह विविधता और अधिक शक्तिशाली बन सकती है। यही विविधता में एकता भारतीय भाषाओं को केवल क्षेत्रीय पहचान से आगे ले जाकर भारतीय सभ्यता की सामूहिक अभिव्यक्ति बनाती है।

पत्रिकाओं ने खोला ज्ञान-विमर्श का नया अध्याय

‘युगवार्ता’ और ‘नवोत्थान’ के विशेषांकों का लोकार्पण भी इसी व्यापक विमर्श की कड़ी बना। भारतीय ज्ञान परंपरा, क्षेत्रीय भाषाओं, संस्कृति और समृद्ध भारत के संकल्प पर केंद्रित विशेषांकों में इस बात को रेखांकित किया गया कि भारत की भाषाओं में संचित ज्ञान को आधुनिक शिक्षा, शोध, तकनीक और नवाचार से जोड़े बिना विकसित भारत की ज्ञान-शक्ति को पूरी तरह सामने नहीं लाया जा सकता। भाषाओं में संरक्षित साहित्य, लोकज्ञान, दर्शन और सांस्कृतिक अनुभव भारत की विशाल बौद्धिक पूंजी हैं। जरूरत इन्हें केवल संरक्षित करने की नहीं, बल्कि नई पीढ़ी और आधुनिक ज्ञान-व्यवस्था से जोड़ने की है।

दादा साहब आप्टे की पुस्तक ने जोड़ा इतिहास का अध्याय

समागम में दादा साहब आप्टे की पुस्तक का विमोचन इस विमर्श को ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। भारतीय भाषाओं और उनके माध्यम से राष्ट्रीय एकता के विचार को आगे बढ़ाने वाले प्रयासों की स्मृति को पुस्तक के माध्यम से सामने लाया गया। पुस्तक का विमोचन यह याद दिलाने वाला अवसर भी बना कि भारतीय भाषाओं को जोड़ने और उनके माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने का विचार नया नहीं है। यह लंबे समय से चल रही उस वैचारिक यात्रा का हिस्सा है, जिसमें भाषा को समाज और राष्ट्र को जोड़ने वाली शक्ति के रूप में देखा गया।

काशी में एक मंच पर सिमटी भारत की भाषाई चेतना

काशी में हुए भारतीय भाषा समागम में पत्रिकाओं और पुस्तकों का यह सामूहिक लोकार्पण महज प्रकाशनों का विमोचन नहीं रहा। यह भारतीय भाषाओं की विविधता, उनकी साझा सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा को एक साथ देखने का अवसर बना। ‘भारतीय भाषाओं में एकता के सूत्र’ ने जहां भाषाई एकात्मता का विचार सामने रखा, वहीं दादा साहब आप्टे की पुस्तक ने इस यात्रा के ऐतिहासिक पक्ष को जोड़ा। ‘युगवार्ता’ और ‘नवोत्थान’ ने इसी विमर्श को भारतीय ज्ञान परंपरा, क्षेत्रीय भाषाओं और विकसित भारत के भविष्य से जोड़ते हुए आगे बढ़ाया। काशी से निकला संदेश स्पष्ट रहा कि भारत की भाषाएं जितनी विविध हैं, उतनी ही विराट उनकी साझा ज्ञानधारा है; इसी ज्ञानधारा को आधुनिक शक्ति में बदलना विकसित भारत की अगली बड़ी यात्रा हो सकती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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