भाषा विरासत और लोकतांत्रिक भविष्य के बीच जीवंत सेतु : विजेंद्र गुप्ता

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भाषा विरासत और लोकतांत्रिक भविष्य के बीच जीवंत सेतु : विजेंद्र गुप्ता


नई दिल्ली, 11 जनवरी (हि.स.)। “भाषा मात्र संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सभ्यतागत विरासत और लोकतांत्रिक भविष्य के बीच जीवंत सेतु है।” इन शब्दों के साथ दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने रविवार को नई दिल्ली में आयोजित तीसरे अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित किया।

यह सम्मेलन “भाषाएं, साहित्य, युवा और प्रौद्योगिकी” विषय पर आयोजित किया गया, जिसमें भारत एवं विदेशों से आए प्रतिष्ठित विद्वानों, लेखकों, भाषाविदों और सांस्कृतिक चिंतकों ने भाग लिया।

समापन समारोह में मुख्य अतिथि लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला उपस्थित रहे, जिन्होंने मुख्य उद्बोधन दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय कला एवं संस्कृति केंद्र (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र) के अध्यक्ष रामबहादुर राय द्वारा की गई। समारोह में उपस्थित विशिष्ट अतिथियों में प्रो. रमेश सी. गौर, डीन (प्रशासन), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र; अनिल जोशी, अध्यक्ष वैश्विक हिंदी परिवार एवं निदेशक अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन; प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी, डीन, भारतीय भाषाएं विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय; श्याम परांडे, महासचिव, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद; ए. विनोद, संयोजक, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास; तथा विनयशील चतुर्वेदी, निदेशक, वैश्विक हिंदी परिवार शामिल रहे।

अपने संबोधन में विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि भारतीय भाषाओं का इतिहास विविधता के माध्यम से निरंतरता का सशक्त प्रमाण है। उन्होंने कहा कि भारत की भाषाएं समुदायों, आस्थाओं और ज्ञान परंपराओं के सतत संवाद से विकसित हुई हैं। अनेक भाषाएं भले आज प्रचलन में न हों, परंतु उनकी बौद्धिक विरासत आज भी जीवित भाषाओं को समृद्ध करती है। उन्होंने कहा कि हमारी भाषायी विरासत स्तरित है; यह विलुप्ति की कहानी नहीं, बल्कि सतत स्मृति की यात्रा है।

भारत की बहुभाषिक सामाजिक संरचना का उल्लेख करते हुए अध्यक्ष ने कहा कि भारतीय नागरिक बचपन से ही अनेक भाषाओं के बीच संवाद करते हुए बड़े होते हैं। यह बहुभाषिक अभ्यास सुनने और समझने की संस्कृति को विकसित करता है तथा भारत को संवाद आधारित सभ्यता के रूप में स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि भारत में भाषायी विविधता का अर्थ कभी विभाजन नहीं रहा; इसका अर्थ सदैव संवाद रहा है।

उन्होंने भारतीय भाषाओं की लिपि परंपरा तथा मौखिक परंपरा दोनों का महत्व रेखांकित किया। आदिवासी एवं लोकभाषायी परंपराओं द्वारा गीत, कथा और अनुष्ठानों के माध्यम से संरक्षित ज्ञान के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा का मूल्य केवल लिखित अभिलेखों से नहीं, बल्कि समुदायों के जीवंत अनुभवों से आंका जाना चाहिए।

तीन दिवसीय सम्मेलन के दौरान आयोजित तैंतालीस सत्रों, पुस्तक एवं कला प्रदर्शनी, फिल्म प्रदर्शन, नाट्य प्रस्तुति और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस मंच ने भाषा को विचार, कला और अभिव्यक्ति के व्यापक रूप में अनुभव कराने का अवसर प्रदान किया। सत्तर से अधिक देशों के विद्वानों और प्रतिनिधियों की सहभागिता से सम्मेलन को अंतरराष्ट्रीय आयाम प्राप्त हुआ, जिसने भारतीय भाषाओं की वैश्विक प्रासंगिकता को पुनः प्रमाणित किया।

अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि लोकतांत्रिक जीवन में भाषा की विशेष जिम्मेदारी है। उन्होंने आह्वान किया कि प्रौद्योगिकी का उपयोग भाषा की गहराई और चिंतन को सशक्त बनाने के लिए हो, न कि उसे सीमित करने के लिए। उन्होंने आयोजकों और प्रतिभागियों को बधाई देते हुए सम्मेलन की निरंतर प्रगति की कामना की। उन्होंने कहा कि यह मंच विद्वता को धैर्य, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाता रहे तथा हमारी भाषाएं हमारी सभ्यतागत शक्ति की सबसे सशक्त संरक्षक बनी रहें।

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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव

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