जिस तरह शरीर का हर अंग जरूरी है, वैसे ही सब मिलकर हिंदू समाज की चिंता करें: डॉ मोहन भागवत

जिस तरह शरीर का हर अंग जरूरी है, वैसे ही सब मिलकर हिंदू समाज की चिंता करें: डॉ मोहन भागवत
जिस तरह शरीर का हर अंग जरूरी है, वैसे ही सब मिलकर हिंदू समाज की चिंता करें: डॉ मोहन भागवत


-कई समाज प्रमुखों से मिले सरसंघचालक

मुरैना, 10 फरवरी (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने कहा कि जैसे शरीर में प्रत्येक अंग की आवश्यकता है। शरीर के हर अंग को सुरक्षित और स्वस्थ रखेंगे, तब ही शरीर स्वस्थ रहेगा। ऐसे ही हम सब मिलकर हिंदू समाज की चिंता करें। संघ में भले ही सामाजिक सद्भाव कार्य की शुरुआत 2007 से हुई है, लेकिन संघ में जात-पात का भेद प्रारंभ से नहीं है। सामाजिक समरसता के लिए संघ प्रारंभ से कार्य कर रहा है।

सरसंघचालक डॉ भागवत शनिवार को मुरैना जिले में आयोजित तीन दिवसीय संघ के प्रांतीय सम्मेलन के अंतिम दिन शनिवार को समाज प्रमुखों से मुलाकात कर उनसे संवाद कर रहे थे। इस दौरान सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत वाल्मीकि समाज के भगवानदास वाल्मीकि, माहौर समाज के नत्थीलाल माहौर, प्रजापति समाज के आशाराम प्रजापति, नागर समाज के राजेंद्र नागर, श्रीवास समाज के मातादीन श्रीवास, राठौर समाज के श्यामलाल राठौर, ब्राह्मण समाज के सुरेश शास्त्री, मांझी समाज के प्रमोद मांझी, वैश्य समाज के डॉ अनिल गुप्ता, जैन समाज के मनोज जैन, स्वर्णकार समाज के मदनलाल वर्मा, सिंधी समाज के प्रताप राय और कायस्थ समाज के दिनेश भटनागर से मिले और उनसे चर्चा की।

डॉ भागवत ने समाज प्रमुखों से कहा कि हम सबको मिलकर अपने हिंदू समाज को अच्छा और सुंदर बनाना है। सभी जाति बिरादरी माह में एक बार बैठने की योजना करें और विचार करें, कि हम सद्भाव के इस कार्य को खंड, मंडल और बस्ती तक कैसे लेकर जाएं। उन्होंने कहा कि 22 जनवरी को श्रीराम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा उत्सव में लघु भारत अयोध्या में दिख रहा था और सम्पूर्ण भारत में अयोध्या की अनुभूति हो रही थी। यह अनुभूति स्थायी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक समय में भारत में जाति एक व्यवस्था थी, जो जन्म के आधार पर नहीं, अपितु कार्य-व्यापार के आधार पर थी।

उन्होंने कहा कि जैसे आज भी हम देखते हैं कि डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, अधिवक्ता का बेटा अधिवक्ता बनाना पसंद करता है। जाति व्यवस्था ने मुगलों के आक्रमण के दौरान अपने हिंदू समाज के लोगों का संरक्षण किया। परंतु कालांतर में यह जाति व्यवस्था एक कुरीति में बदल गई। पूज्य संतों ने भी अनेक अवसरों पर हमें यह बात समझाने का प्रयत्न किया है। आज आवश्यकता है कि हम सब मिलकर छुआछूत को समाप्त करें।

हिन्दुस्थान समाचार/मुकेश/आकाश

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