शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति निष्ठा अपनाएं शिक्षक : जे. नन्द कुमार

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शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति निष्ठा अपनाएं शिक्षक : जे. नन्द कुमार


- शिक्षक समाज में वैचारिक और सांस्कृतिक चेतना के वाहक : कुलपति झांसी, 06 सितंबर (हि.स.)। औपनिवेशिक सोच और अपनी संस्कृति व साहित्य की विस्मृति देश के विकास की राह में बड़ी बाधा है। भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा से जोड़कर ही समाज में व्यापक बदलाव लाया जा सकता है। शिक्षक नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, साहित्य और ज्ञान परंपरा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह बात प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय समन्वयक जे. नन्द कुमार ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में आयोजित ‘शिक्षक संवाद’ कार्यक्रम में कही।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष एवं शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में जे. नन्द कुमार ने गीता के श्लोकों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षक को व्यक्तिगत स्वार्थ और आकांक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण के लिए आदर्श आचरण प्रस्तुत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक व्यवस्था के दौरान भारतीय ग्रंथों, संस्कृति और सभ्यता के साथ छेड़छाड़ हुई, जिसके कारण नई पीढ़ी अपने गौरवशाली अतीत से पूरी तरह परिचित नहीं हो सकी। अब शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों और साहित्य को विद्यार्थियों से जोड़ें।

उन्होंने देश को विकसित बनाने के संदर्भ में ‘सिक्स आई’ की अवधारणा रखते हुए इंसेंसिबिलिटी, इग्नोरेंस, इररेवेरेंस, इलविल, इनेक्शन और इनकंपिटेंस को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि भारतीय बौद्धिक परंपरा केवल अतीत का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान समस्याओं और भविष्य की आवश्यकताओं के समाधान का आधार भी बन सकती है। स्वामी विवेकानंद के ‘फ्यूचर ऑफ इंडिया’ भाषण का उल्लेख करते हुए उन्होंने शिक्षकों से राष्ट्र गौरव को पुनर्जीवित करने और अतीत की निराशा को पीछे छोड़कर बेहतर भविष्य के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि शिक्षा विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ विवेक, आत्मविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. मुकेश पांडेय ने की। उन्होंने कहा कि शिक्षक राष्ट्र और समाज निर्माण की आधारशिला हैं। बदलते समय में शिक्षकों को नवीन तकनीक और ज्ञान अपनाने के साथ भारतीय जीवन मूल्यों एवं सांस्कृतिक चेतना को भी शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन प्रो. अनुपम व्यास ने किया।

इसमें विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के कुलपति, निदेशक, प्राचार्य, शिक्षक और शिक्षाविद् बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

अंत में आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम का समापन कल्याण मंत्र के साथ हुआ। इनमें प्रो. टी.के. शर्मा, प्रो. एस.के. राय, प्रो. चन्द्र चौहान, डॉ. जितेन्द्र मिश्र, डॉ. ओमशंकर चौरसिया, डॉ. राजीव दीक्षित, डॉ. मोनिका त्रिपाठी, डॉ. विवेक गुप्ता, डॉ. नीरज कुमार, डॉ राघवेन्द्र दीक्षित सहित बड़ी संख्या में शिक्षक और शिक्षाविद् सम्मिलित हुए।

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हिन्दुस्थान समाचार / महेश पटैरिया

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