आरएसएस समाज को संगठित और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने का कर रही काम : राजू दास

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आरएसएस समाज को संगठित और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने का कर रही काम : राजू दास


आरएसएस समाज को संगठित और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने का कर रही काम : राजू दास


संघ के शताब्दी वर्ष पर रांची में विराट हिंदू सम्मेलन हुआ आयोजित

रांची, 01 मार्च (हि.स.)। अयोध्या के हनुमान गढ़ी के महंत राजू दास ने कहा कि पिछले 100 वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने समाज को संगठित करने, राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करने का निरंतर प्रयास किया है। उन्होंने प्रश्न रखा कि देश सुरक्षित कैसे रहे, आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान और परंपरा से जुड़ी कैसे रहें और भारत पुनः किस प्रकार की दासता का शिकार न हो—इन सभी विषयों पर संघ ने निरंतर चिंतन और कार्य किया है।

दास रविवार को रांची के चुटिया स्थित श्री राम मंदिर परिसर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर आयोजित विराट हिंदू सम्मेलन में बोल रहे थे। उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए हुए दीर्घकालिक संघर्ष और लाखों रामभक्तों के त्याग और बलिदान का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल मंदिर निर्माण का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ऐसे ऐतिहासिक संघर्षों की स्मृति हमें संगठित रहने और अपनी आस्था व परंपराओं की रक्षा करने की प्रेरणा देती है। उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष के अवसर पर देश के लगभग एक लाख गांवों में हिंदू सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें करोड़ों लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है।

हिंदू समाज जाना जाता है अपनी उदारता के लिए : आलोक

मौके पर संघ के सह-सरकार्यवाह आलोक ने संगठन की शक्ति और एकता के महत्व को महाभारत के प्रसंग के माध्यम से स्पष्ट किया। उन्होंने देवताओं और असुरों के युद्ध की कथा का उदाहरण देते हुए कहा कि बिखराव पराजय का कारण बनता है, जबकि एकता विजय का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने कहा कि जब लोग साथ चलते और साथ बोलते हैं, तो उनके मन भी एक हो जाते हैं और यही एकता किसी भी चुनौती का सामना करने की वास्तविक शक्ति है।

उन्होंने कहा कि हिंदू समाज अपनी विविधता और उदारता के लिए जाना जाता है। अलग-अलग उपासना पद्धतियां, देवी-देवताओं के प्रति अलग-अलग आस्थाएं और विभिन्न परंपराएं हमारी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक हैं, लेकिन समय-समय पर एक नाम और एक उद्देश्य के लिए संगठित होना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने सामाजिक समरसता पर बल देते हुए छुआछूत की भावना समाप्त करने का आह्वान किया। संत रविदास, मीराबाई और महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुषों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में जन्म नहीं, बल्कि कर्म और भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

उन्होंने पंच परिवर्तन की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि समाज में समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी भावना और नागरिक कर्तव्य का पालन—ये सभी परिवर्तन आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि परिवार भारतीय समाज की मूल इकाई है और परिवार में संवाद, संस्कार एवं सामूहिकता की परंपरा को पुनर्जीवित करना समय की आवश्यकता है। भारत ने अनेक आक्रमणों और चुनौतियों के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को इसलिए सुरक्षित रखा क्योंकि परिवारों ने अपने मूल्यों को जीवित रखा।

उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को लेकर रांची की बदलती पर्यावरणीय स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित किया और कहा कि जो शहर कभी स्वच्छ वातावरण के लिए प्रसिद्ध था, वहां आज वायु गुणवत्ता चिंताजनक स्तर पर पहुंच रही है। इसे संतुलित करने के लिए सामूहिक जागरूकता और प्रयास आवश्यक हैं। साथ ही उन्होंने संविधान के अनुरूप नागरिक कर्तव्यों के पालन, सामाजिक सद्भाव और सकारात्मक आचरण को समाज की प्रगति का आधार बताया।

कार्यकम मे बच्चों की ओर से रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और लव जेहाद पर प्रस्तुत की गई लघु नाटिका आकर्षण का केंद्र रही।

सम्मेलन में शहर और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग उपस्थित थे । कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में एकता, समरसता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रभाव को सुदृढ़ करना बताया गया।

इसके पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ चुटिया स्थित राममंदिर के प्रांगन से कलश यात्रा निकली गयी। इसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। इस शोभा यात्रा में हनुमान गाढ़ी में महंत और राम मंदिर के महंत जी को रथ पर बिठाकर कार्यक्रम स्थल तक गाजे बजे के साथ लाया गया। कार्यक्रम वैदिक मंत्रोच्चार और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।

वहीं प्रारंभिक संबोधन में श्री राम मंदिर, चुटिया के महंत ने कहा कि सम्मेलन में उपस्थित जनसमूह केवल संख्या नहीं, बल्कि जागृत और संगठित समाज की प्रतीक शक्ति है। उन्होंने कहा कि साथ चलना, साथ बोलना और एक लक्ष्य के लिए संगठित होना ही समाज की वास्तविक शक्ति है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सनातन समाज को संगठित करने की आवश्यकता पहले से अधिक है और ऐसे सम्मेलन समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं।

सम्मेलन में संत समाज के प्रतिनिधियों, मातृ शक्ति, गायत्री परिवार, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू जागरण मंच, मंदा पूजा समिति चुटिया तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की सक्रिय उपस्थिति रही।

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हिन्दुस्थान समाचार / विकाश कुमार पांडे

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