अवैध घुसपैठ रोकना गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी, नाकाम रहने पर गृह मंत्री जवाबदेह : मदनी

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अवैध घुसपैठ रोकना गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी, नाकाम रहने पर गृह मंत्री जवाबदेह : मदनी


अवैध घुसपैठ रोकना गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी, नाकाम रहने पर गृह मंत्री जवाबदेह : मदनी


- राष्ट्रीय कार्यकारिणी में समान नागरिक संहिता और मुसलमानों को निशाना बनाने के कथित प्रयासों के खिलाफ प्रस्ताव पारित

नई दिल्ली, 01 नवंबर (हि.स.)। जमीअत उलमा-ए-हिंद की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अवैध घुसपैठ, मुसलमानों के संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिक संहिता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्र सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भारत में किसी भी विदेशी नागरिक की अवैध मौजूदगी का जमीअत समर्थन नहीं करती, लेकिन घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की है।

हरियाणा के नूंह (मेवात) में 30 और 31 अक्टूबर को हुई इस बैठक में देशभर से 3,000 से अधिक उलमा ने हिस्सा लिया।

बैठक को संबोधित करते हुए

मौलाना मदनी ने कहा कि यदि गृह मंत्री अवैध घुसपैठ होने देते हैं या जानबूझकर इसे रोकने में नाकाम रहते हैं, तो वे सबसे बड़े गद्दार हैं। उन्होंने सवाल किया कि अवैध घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी निभाने वाले मंत्रालय से जवाब मांगने के बजाय मुसलमानों को राजनीतिक रूप से निशाना क्यों बनाया जा रहा है।

जनसांख्यिकीय बदलावों पर स्वतंत्र आयोग की मांग

राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने मुसलमानों की आबादी और जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर फैलाए जा रहे कथित भ्रामक नैरेटिव, विशेषकर 'डेमोग्राफिक जिहाद' के आरोपों को खारिज करते हुए प्रस्ताव पारित किया।

प्रस्ताव में जनगणना और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर 1981-1991 के दौरान 32.9 प्रतिशत थी, जो 2001-2011 में घटकर 24.7 प्रतिशत रह गई। जमीअत के अनुसार जनसंख्या में बदलाव को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर समझा जाना चाहिए, न कि सांप्रदायिक नजरिए से। संगठन ने मांग की कि सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को शामिल करते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष आयोग गठित करे, जो प्रवासन, शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का वैज्ञानिक अध्ययन करे।

बैठक में गुजरात, उत्तराखंड, असम और अन्य राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने के प्रयासों के खिलाफ भी प्रस्ताव पारित किया गया।सामान नागरिक संहिताा को धार्मिक स्वतंत्रता, पारिवारिक मामलों में स्वायत्तता और संविधान से मिले मौलिक अधिकारों के लिए चुनौती बताया।

जमीअत के अनुसार विवाह, तलाक और विरासत से जुड़े इस्लामी नियम कुरआन और हदीस पर आधारित हैं। ऐसे मामलों में हस्तक्षेप मुस्लिम धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

जमीअत ने उत्तराखंड और गुजरात में अनुसूचित जनजातियों को समान नागरिक संहिता से दी गई छूट और मुसलमानों को इसके दायरे में लाने पर भी आपत्ति जताई। संगठन ने इसे समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के संदर्भ में विचारणीय बताते हुए अनुच्छेद 14, 25 और 26 का हवाला दिया।

कार्यकारिणी ने सामान नागरिक संहिता के खिलाफ कानूनी लड़ाई को तेज करने और उत्तराखंड, गुजरात तथा असम के संबंधित कानूनों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय लिया। इसके साथ ही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी और अन्य संगठनों के साथ मिलकर व्यापक लोकतांत्रिक अभियान चलाने का आह्वान किया।राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय कानून मंत्री और संबंधित राज्यों के राज्यपालों एवं मुख्यमंत्रियों को ज्ञापन भी सौंपे जाएंगे।

मौलाना मदनी ने बहुसंख्यक समुदाय के खतरे में होने के राजनीतिक नैरेटिव पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश की असली चुनौती बहुसंख्यक समुदाय की सुरक्षा नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीतिक पदों की भूख है।

उन्होंने मुसलमानों से शरीअत के प्रति प्रतिबद्धता बनाए रखने के साथ परिवारों में महिलाओं के अधिकारों और न्याय सुनिश्चित करने की अपील की। विशेष रूप से तलाक, भरण-पोषण और मेहर से जुड़े मामलों को ईमानदारी और न्यायपूर्ण तरीके से निपटाने पर जोर दिया।

हिन्दुस्थान समाचार/अब्दुल वाहिद

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हिन्दुस्थान समाचार / Abdul Wahid

Livevns.news Desk
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