योग भारत की ओर से मानवता को मिला अमूल्य उपहार, इसे जीवन का हिस्सा बनाएं : उपराष्ट्रपति

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योग भारत की ओर से मानवता को मिला अमूल्य उपहार, इसे जीवन का हिस्सा बनाएं : उपराष्ट्रपति


नई दिल्ली, 21 जून (हि.स.)। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का ऐसा अमूल्य उपहार है, जिसे पूरी मानवता के कल्याण के लिए विकसित किया गया है। उन्होंने लोगों से योग को अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाने और एक स्वस्थ, खुशहाल तथा शांतिपूर्ण समाज के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।

लद्दाख के लेह में आयोजित अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत के ऋषि-मुनियों ने वर्षों की साधना, तपस्या, ध्यान और आध्यात्मिक खोज के माध्यम से योग जैसी समग्र जीवन पद्धति विकसित की। यह न केवल शरीर को स्वस्थ और सशक्त बनाती है, बल्कि मन को शांत करने और आत्मिक उत्थान का मार्ग भी प्रशस्त करती है।

उन्होंने कहा कि योग व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास का प्रभावी माध्यम है। वर्तमान समय में जब दुनिया तनाव, असंतुलित जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब योग मानवता के लिए एक व्यवहारिक और स्थायी समाधान प्रस्तुत करता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और पहल के कारण योग को वैश्विक स्तर पर अभूतपूर्व पहचान मिली है। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किए गए आह्वान को 175 से अधिक सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता मिली। यह भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को मिला एक महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मान है।

इस वर्ष की थीम स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि चिकित्सा सुविधाओं में सुधार और बढ़ती जीवन प्रत्याशा के कारण समाज में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि लोग केवल अधिक समय तक जीवित ही न रहें, बल्कि स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानजनक जीवन भी जी सकें। योग इस दिशा में अत्यंत प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने इंडिया एजिंग रिपोर्ट-2023 का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2050 तक भारत की लगभग 20 प्रतिशत आबादी वरिष्ठ नागरिकों की होगी। ऐसे परिदृश्य में योग को जन-आंदोलन के रूप में अपनाने की आवश्यकता है, ताकि बढ़ती आयु के साथ भी लोगों का स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और जीवन की गुणवत्ता बनी रहे।

लद्दाख की भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जीवन जीने के लिए सहनशक्ति, अनुशासन और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता आवश्यक होती है। योग इन सभी गुणों को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान देता है। उन्होंने कहा कि लद्दाख के लोग लंबे समय से सादगी, धैर्य, लचीलेपन और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते रहे हैं, जो योग दर्शन के मूल सिद्धांतों से गहराई से जुड़े हुए हैं।

लद्दाख के लोगों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि अपने प्रवास के दौरान उन्होंने यहां के लोगों को शांत, सौम्य, दयालु और प्रकृति के प्रति संवेदनशील पाया। उन्होंने कहा कि इन गुणों के कारण लद्दाख की संस्कृति विशिष्ट पहचान रखती है। यदि इन मूल्यों के साथ नियमित योगाभ्यास को जोड़ा जाए, तो यह लोगों को अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुंचने और जीवन में अधिक संतुलन प्राप्त करने में सहायता करेगा।

इस अवसर पर लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना, लद्दाख से लोकसभा सांसद मोहम्मद हनीफा, कारगिल स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद के मुख्य कार्यकारी पार्षद मोहम्मद जाफर अखून, लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा, वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, योग प्रशिक्षक, छात्र, वरिष्ठ नागरिक और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे।

इससे पूर्व उपराष्ट्रपति ने महाबोधि इंटरनेशनल मेडिटेशन सेंटर (एमआईएमसी) के देवचन परिसर का भी दौरा किया। इस दौरान उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सामाजिक कल्याण, पर्यावरण संरक्षण, योग और ध्यान के क्षेत्र में संस्थान द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऐसे संस्थान समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने और मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।-------------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

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