आईआईटी जोधपुर में भाषाओं में छिपे ज्ञान, व्याकरण, संस्कृति और मानव मस्तिष्क के संबंधों का हो रहा अध्ययन

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आईआईटी जोधपुर में भाषाओं में छिपे ज्ञान, व्याकरण, संस्कृति और मानव मस्तिष्क के संबंधों का हो रहा अध्ययन


जोधपुर, 23 सितम्बर (हि.स.)। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समुदाय की परंपराओं, सामाजिक जीवन, स्थानीय ज्ञान और दुनिया को देखने के नजरिए को पीढिय़ों तक सुरक्षित रखने का माध्यम भी है। इसी दृष्टिकोण से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जोधपुर के स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के सहायक प्रोफेसर डॉ. गुरूजेगन मुरुगेसन कम बोली जाने वाली भाषाओं पर शोध कर रहे हैं।

उनके शोध में मैदानी अध्ययन, भाषा का दस्तावेजीकरण, व्याकरण के अध्ययन के साथ भाषा के संरक्षण और पुनर्जीवन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वर्तमान में दुनिया में करीब 7,164 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें लगभग 44 प्रतिशत भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें एक हजार से भी कम लोग बोलते हैं। ऐसे में इन भाषाओं के साथ उनमें संरक्षित स्थानीय ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के भी समाप्त होने का खतरा है।

डॉ. मुरुगेसन ने बताया कि किसी भाषा के संकट में आने पर केवल भाषा प्रभावित नहीं होती, बल्कि उसमें पीढिय़ों से जुड़ा सांस्कृतिक ज्ञान और जीवन जीने के तरीके भी प्रभावित होते हैं। इसलिए उनका मैदानी अध्ययन भाषा को दर्ज करने के साथ उस ज्ञान को समझने पर भी केंद्रित है, जिसे समुदाय अपनी भाषा के माध्यम से आगे बढ़ाता आया है।

शोध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा राजस्थान के ओसियां क्षेत्र में भील समुदाय के साथ किए जा रहे मैदानी अध्ययन से जुड़ा है। थार के रेगिस्तानी वातावरण में रहने वाले समुदायों ने कठिन जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप जीवन जीने के विशिष्ट तरीके विकसित किए हैं। इनमें घर बनाने, भोजन, पहनावे और सीमित जल संसाधनों के समझदारी से उपयोग से जुड़ी पारंपरिक प्रथाएं शामिल हैं।

शोधकर्ता यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि यह स्थानीय ज्ञान समुदाय की भाषा से किस प्रकार जुड़ा है और नई पीढ़ी में भाषा का इस्तेमाल कम होने से इस ज्ञान के हस्तांतरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। शोध दल प्रत्येक सत्र में मैदानी दौरे कर भाषाई जानकारी और सांस्कृतिक ज्ञान को दर्ज करता है।

शोध का दूसरा प्रमुख क्षेत्र झारखंड के मुंडा समुदायों द्वारा बोली जाने वाली मुंडारी भाषा है। यह ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित है। शोध के दौरान एकत्र आंकड़ों के विश्लेषण में मुंडारी की एक विशिष्ट और दुर्लभ संख्या प्रणाली सामने आई है।

इस विशेषता के अध्ययन से यह समझने के नए अवसर मिले हैं कि विभिन्न भाषाओं में व्याकरणिक संरचनाएं किस प्रकार विकसित होती हैं। शोधकर्ता यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि ऐसी व्याकरणिक व्यवस्था दुर्लभ क्यों है और मुंडारी अन्य भाषाओं से किस प्रकार अलग व्यवहार करती है। इससे मानव भाषा की संरचना और विकास को समझने वाले सैद्धांतिक भाषाविज्ञान को भी महत्वपूर्ण जानकारी मिल रही है।

शोध का तीसरा क्षेत्र प्रवासी समुदायों में विरासत की भाषाओं पर केंद्रित है। सहयोगी शोध परियोजना के तहत स्विट्जरलैंड में दूसरी पीढ़ी के प्रवासी समुदाय के बीच तमिल भाषा का अध्ययन किया जा रहा है। यहां परिवारों में तमिल का इस्तेमाल होता है, जबकि व्यापक सामाजिक वातावरण में स्विस जर्मन और फ्रेंच भाषाओं का प्रयोग अधिक होता है। शोध में यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि बहुभाषी वातावरण में पले-बढ़े बच्चों और युवाओं में विरासत की भाषा का विकास और इस्तेमाल किस प्रकार प्रभावित होता है।

यह परियोजना स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ लॉज़ेन की प्रो. अनिता ऑयर के सहयोग से संचालित की जा रही है और इसे स्विस नेशनल साइंस फाउंडेशन तथा इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च का समर्थन प्राप्त है। इन शोध क्षेत्रों के माध्यम से आईआईटी जोधपुर भाषा के विकास, उसमें संरक्षित ज्ञान तथा भाषा, समाज और संस्कृति के बीच संबंधों को समझने की दिशा में अध्ययन कर रहा है।-----------------------------------------

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश

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