संस्कृति की निरंतरता के लिए युवाओं का अपनी जड़ों से जुड़ना अनिवार्य : डॉ. मयंक शेखर

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संस्कृति की निरंतरता के लिए युवाओं का अपनी जड़ों से जुड़ना अनिवार्य : डॉ. मयंक शेखर


संस्कृति की निरंतरता के लिए युवाओं का अपनी जड़ों से जुड़ना अनिवार्य : डॉ. मयंक शेखर


नई दिल्ली, 02 जुलाई (हि.स.)। राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन (एनएमसीएम) के मिशन निदेशक डॉ. मयंक शेखर ने गुरुवार को कहा कि आज के पाश्चात्य प्रभाव के दौर में हमारी युवा पीढ़ी (जेन जी) को अपनी जड़ों, समृद्ध अतीत और सांस्कृतिक विरासत से जोड़े रखना अनिवार्य है जिससे संस्कृति की निरंतरता बनी रहे।

दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन (एनएमसीएम) ने दस दिवसीय प्रदर्शनी का आयोजन किया था, जिसका विषय ‘लिविंग हेरिटेज इन मेटल, बैम्बू एंड क्ले: ट्रेडिशनल यूटेंसिल्स ऑफ नॉर्थईस्ट इंडिया’ (धातु, बांस और मिट्टी की जीवंत विरासत: पूर्वोत्तर भारत के पारंपरिक बर्तन) रहा। प्रदर्शनी के अंतिम दिन (आज) सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव चंचल कुमार ने इसका अवलोकन किया।

डॉ. मयंक शेखर ने 'जेन जी' पीढ़ी के लिए प्रदर्शनी का महत्व समझाते हुए हिन्दुस्थान समाचार को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा, पूर्वोत्तर राज्यों के पारम्परिक बर्तन सिर्फ खाने-पीने की वस्तुएं नहीं हैं। ये हमारी 'कलेक्टिव मेमोरी' (सामूहिक स्मृति) और भारतीय जीवन दृष्टि के प्रतीक हैं। आज जब पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है, तब यह आवश्यक है कि हमारी भावी पीढ़ी यह जानें कि 50 साल पहले हमारा जीवन कैसा था। यह प्रदर्शनी हमारी सभ्यता के ताने-बाने को समझने का एक माध्यम है।

उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शनी को लगाने की मुख्य प्रेरणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विजन है। वर्ष 2024 में 'भारत मंडपम' में प्रधानमंत्री ने पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को 'अष्टलक्ष्मी' की संज्ञा दी थी। जिस प्रकार देवी लक्ष्मी के आठ स्वरूप हैं, वैसे ही ये आठ राज्य हमारी सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक हैं। इसी प्रेरणा से प्रेरित होकर, मिनिस्ट्री ऑफ डोनर के अंतर्गत एनईएचएचडीसी और हमारे एनएमसीएम ने मिलकर इस दस दिवसीय प्रदर्शनी का आयोजन किया।

उन्होंने बताया कि प्रदर्शनी का असली मकसद पूर्वोत्तर राज्यों के पारंपरिक बर्तनों के जरिए यहां के सशक्त सामाजिक-पर्यावरणीय संबंधों और समृद्ध सामुदायिक इतिहास को दुनिया के सामने लाना था।

आगे की योजनाओं पर डॉ शेखर बात करते हुए बताते हैं कि आने वाले दिनों में हम हिमाचल प्रदेश की लोक कला, बिहार की 'पीडिया कला' और 'टिकुली आर्ट', तथा गुजरात की 'रोगन आर्ट' पर कार्यशालाएं आयोजित करने वाले हैं।

'मेरा गांव मेरी धरोहर' पोर्टल का जिक्र करते हुए कहा कि यह प्रधानमंत्री मोदी का 'ड्रीम प्रोजेक्ट' है। इस पर भारत के 6 लाख से अधिक गांवों की सांस्कृतिक जानकारी समाहित है, जहां लोग न केवल अपने गाँव की विरासत को देख सकते हैं, बल्कि क्राउडसोर्सिंग के जरिए उसमें सुधार और जानकारी साझा भी कर सकते हैं।

इस दौरान असम के 'बेल मेटल क्राफ्ट' (जैसे होरई, दुलोरी, बान-बाटी), मेघालय के अद्वितीय 'लारनाई पॉटरी' ( जो पूर्णतः हाथ से बिना चाक के बनाई जाती है), मणिपुर के 'लॉन्ग्पी' पॉटरी (जो अपनी निर्माण प्रक्रिया में लारनाई जैसी ही अनोखी है।) सहित अन्य राज्यों अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और सिक्किम की विशेष बास्केट्री (केन और बम्बू आर्ट) को प्रदर्शित किया गया था।

उल्लेखनीय है कि इसका उद्घाटन 23 जून को आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव लिली पाण्ड्या, डॉ. शाह फैज़ल (उप सचिव) और पद्मश्री से सम्मानित समाजसेवी टेची गोबिन के मार्गदर्शन में किया गया था। पहले ही दिन 'बेल मेटल क्राफ्ट ऑफ असम' और 'चितेरी आर्ट ऑफ बुंदेलखंड' पर मोनोग्राफ का विमोचन भी किया था।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

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