कांची की आध्यात्मिक भूमि से विश्व कल्याण का संदेश, आचार्यों से मिले संघ प्रमुख मोहन भागवत
- वामन जयंती पर ओरिक्कै पहुंचे संघ प्रमुख, श्री चंद्रमौलीश्वर स्वामी के अभिषेक के दर्शन किए
- ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना के बीच कांची में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का आध्यात्मिक प्रवास
कांचीपुरम/नई दिल्ली, 23 सितंबर (हि.स.)। कांची की प्राचीन आध्यात्मिक भूमि से बुधवार को भारतीय संस्कृति की उस वैश्विक चेतना का संदेश निकला, जो अपने लिए ही नहीं, समूची मानवता के कल्याण की कामना करती है। वेदमंत्रों की गूंज, वैदिक अनुष्ठानों और आचार्यों के सानिध्य के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने वामन जयंती के अवसर पर ओरिक्कै में चातुर्मास्य कर रहे कांची आचार्यों से भेंट की। आयोजन में राष्ट्र और समाज के साथ पूरे विश्व की शांति, समृद्धि और सुख की कामना भारतीय संस्कृति के ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ भाव को सामने ले आई।
भागवत ने श्रीकांची कामकोटि पीठम् के जगद्गुरु शंकर विजयेंद्र सरस्वती शंकराचार्य स्वामिगल द्वारा किए जा रहे श्री चंद्रमौलीश्वर स्वामी के अभिषेक के दर्शन किए। इसके बाद उन्होंने वैदिक विद्वानों द्वारा समाज, राष्ट्र और समस्त विश्व के कल्याण के लिए किए जा रहे वेदपाठ, जप और विशेष प्रार्थनाओं में भाग लिया। आदि शंकराचार्य की दिव्य पादुकाओं का टोटकाष्टकम् के पाठ के साथ विशेष पूजन हुआ। पीठम् की ओर से उन्हें पारंपरिक शिरोवस्त्र पहनाकर सम्मानित किया गया और कामाक्षी मंदिर का प्रसाद भेंट किया गया। भारतीय संस्कृति की विशेषता उसके व्यापक लोककल्याण के भाव में देखी जाती है। इसी भाव को आयोजन में परिवार और सामाजिक मूल्यों के माध्यम से भी सामने रखा गया। आचार्य और मोहन भागवत की उपस्थिति में पारंपरिक दंपती पूजा आयोजित हुई। 60 वर्ष का वैवाहिक जीवन पूरा कर चुके 88 वर्षीय दंपती ने 60 वृद्ध दंपतियों का सम्मान किया। यह आयोजन पीढ़ियों के बीच सम्मान, परिवार की भूमिका और अनुभव की परंपरा को आगे बढ़ाने का संदेश देता नजर आया। मोहान भागवत ने ‘संग्रहणीयेष्टि’ श्रोत अनुष्ठान की पूर्णाहुति में भी भाग लिया। यह अनुष्ठान विश्वभर के लोगों की शांति, समृद्धि और सुख-समृद्धि की कामना के लिए किया गया।
प्राचीन ज्ञान, नई पीढ़ी और वैश्विक भविष्य
यात्रा के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कांची मठ की विद्या, वेद और वैद्य से जुड़ी विभिन्न पहलों का अवलोकन किया। विद्यालयों, वेद पाठशालाओं, पारंपरिक शिल्प एवं मूर्तिकला प्रशिक्षण केंद्रों तथा बालिकाओं के सांस्कृतिक शिक्षा संस्थानों को देखा। उन्होंने आचार्य के आशीर्वाद से संचालित मंदिर प्रबंधन पाठ्यक्रम के प्रथम बैच के विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र भी प्रदान किए। यह पहल इस विचार को सामने रखती है कि संस्कृति केवल विरासत के संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान, कौशल, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने का माध्यम भी है। वेदपाठ के साथ आधुनिक शिक्षा, शिल्प प्रशिक्षण और मंदिर प्रबंधन जैसे क्षेत्रों को जोड़ना परंपरा को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने का प्रयास है।
1955 की स्मृति से जुड़ा सांस्कृतिक सेतु
सरसंघचालक मोहन भागवत ने ओरिक्कै स्थित उस एक शताब्दी पुराने ग्रामीण घर का भी दौरा किया, जहां गुरुजी एमएस गोलवलकर ने 1955 में कांची महास्वामी के दर्शन किए थे। परिवार की ओर से उस ऐतिहासिक मुलाकात की स्मृति में उन्हें स्मृति-चिह्न भेंट किया गया। कांची आचार्य त्रिवेणी ने भी 1988 में इसी स्थान पर चातुर्मास्य किया था। कांची की इस यात्रा में अतीत की आध्यात्मिक विरासत, वर्तमान की सामाजिक जिम्मेदारी और भविष्य की सांस्कृतिक चेतना एक साथ दिखाई दी। वेद, परिवार, शिक्षा, कला, शिल्प और सेवा को जोड़ती यह परंपरा भारतीय संस्कृति के उस व्यापक दृष्टिकोण को सामने रखती है, जिसमें ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ केवल विचार नहीं, बल्कि समूची मानवता के कल्याण की जीवन-दृष्टि है। कार्यक्रम का समापन पीठम् के आशीर्वचन के साथ हुआ।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ .राजेश

