नदियों के संरक्षण और संर्वधन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने किया उच्च स्तरीय कमेटी का गठन

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रायपुर, 16 जुलाई (हि.स.)। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद प्रदेश की 19 नदियों के संरक्षण और संर्वधन के लिए उनके उद्गम स्थलों को अतिक्रमण से बचाने के लिए राज्य सरकार एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठित कर कर दिया है। इसके साथ ही, राजस्व रिकॉर्ड में जिन उद्गम स्थलों को भूलवश 'नाला' या अन्य भूमि दर्ज किया गया था, अब उन्हें आधिकारिक तौर पर 'नदी' के रूप में ही दर्ज किया जाएगा। बुधवार को राज्य के मुख्य सचिव ने सभी चयनित मुख्य नदियों के उद्गम स्थल को चिन्हांकित कर सुरक्षित करने की बात उच्च न्यायालय में कही है ।

मुख्य सचिव ने आज बताया कि विषय विशेषज्ञों की एक टीम बनाकर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत नदियों को संरक्षित किया जाएगा। सुनवाई के दौरान सभी नदियों और उनके उद्गम स्थल को राजस्व रिकार्ड में दर्ज करने का आदेश उच्च न्यायालय ने दिया है। शासन द्वारा प्रस्तुत जवाब में कहा गया कि 6 नदियों महानदी, हसदेव, तांदूला, पैरी, केलो, मांड के लिए कमेटी का गठन कर दिया गया है।

याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान बताया कि सरकार नदियों के उदगम स्थल के संरक्षण की बात तो कर रही है लेकिन इसके बाद आगे 2 किलोमीटर क्षेत्र तक के प्राकृतिक प्रवाह पर ध्यान नहीं है। इन क्षेत्रों में कब्जा करते हुए खेती हो रही है। इसे भी संरक्षित करना होगा। कहीं कोई निजी जमीन है तो उसका अधिग्रहण सरकार को करना होगा, कब्जे हटाने होंगे। इसके बाद ही नदियों का प्रवाह बेहतर हो सकेगा।

उच्च न्यायालय ने इस पर सहमति जताते हुए सरकार को इस तरफ ध्यान देने कहा है। न्यायालय ने कहा कि राज्य से निकलने वाली नदियों के उद्गम स्थल आखिर क्यों सूख रहे हैं, यह जानने और इन स्थलों को तलाशना सबसे जरूरी है।

उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने नदियों में बढ़ते प्रदूषण, फैक्टरियों के काले कचरे और अरपा, शिवनाथ एवं खारून जैसी नदियों के जहरीले होते पानी से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों को बेहद गंभीरता से लिया है। इसके बाद अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज कर इस पर सुनवाई शुरू की है। इसके बाद इस स्वतः संज्ञान के साथ ही, पर्यावरण और नदी संरक्षण से जुड़े स्थानीय पर्यावरणविदों, अधिवक्ताओं अरविंद शुक्ला व रामनिवास तिवारी और सामाजिक संगठनों ने भी सहायक याचिकाएं और जरूरी दस्तावेज अदालत के सामने पेश किए हैं। इनके जरिए अदालत को बताया गया कि कैसे सरकारी राजस्व रिकॉर्ड की लापरवाही के कारण नदियों के उद्गम स्थल 'नाले' के रूप में दर्ज होकर प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की 19 नदियों के उद्गम स्थलों के संरक्षण और राजस्व रिकॉर्ड में सुधार को लेकर बिलासपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच का कड़ा रुख जुलाई 2025 में शुरू हुआ था, जो लगातार जारी है। जुलाई 2025 अधिवक्ता अरविंद शुक्ला और रामनिवास तिवारी की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पहली बार इस बात पर गंभीर नाराजगी जताई थी कि राजस्व रिकॉर्ड में छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदियों के उद्गम स्थलों को 'नाला' दर्ज किया गया है। इसी दौरान अदालत ने राज्य सरकार को एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाने का पहला आदेश दिया था। जब सरकार ने इस कमेटी में केवल प्रशासनिक अधिकारियों (सचिवों) को रखा, तो अदालत ने इस पर दोबारा सख्त आपत्ति जताई।

अदालत के निर्देश के बाद 11 मार्च 2026 को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समीक्षा बैठक बुलाई गई। इसके बाद अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि 7 मई 2026 तक नया शपथ पत्र देकर कमेटी में पर्यावरणविदों, भूवैज्ञानिकों और जल-विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। मई 2026 के पहले हफ्ते में सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने ने अरपा, खारून और शिवनाथ जैसी नदियों के जहरीले होते पानी पर बेहद कड़ा रुख अपनाया और इसे प्रशासनिक तंत्र की सिस्टमैटिक विफलता करार दिया।

अदालत की आपत्ति के बाद अब राज्य स्तरीय समिति जिसके अध्यक्ष मुख्य सचिव हैं, उनमें सिर्फ सरकारी अधिकारी नहीं होंगे। इसमें अब एक पारिस्थितिकी विज्ञानी, भूवैज्ञानिक, हाइड्रोलॉजिस्ट और पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधि अनिवार्य रूप से शामिल किए गए हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / केशव केदारनाथ शर्मा

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