मप्र के ग्वालियर मदरसा पर छापे के साथ ही देश भर में उठते सवाल आए सामने

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मप्र के ग्वालियर मदरसा पर छापे के साथ ही देश भर में उठते सवाल आए सामने


मप्र के ग्वालियर मदरसा पर छापे के साथ ही देश भर में उठते सवाल आए सामने


सरकारी जमीन पर वक्फ दावे, अवैध निर्माण और मस्जिद विवाद

भोपाल/ग्वालियर, 26 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर के बीचोबीच स्थित एक मदरसे और मस्जिद परिसर पर बाल अधिकार संरक्षण आयोग के हालिया छापे ने एक बार फिर उन सवालों को सतह पर ला दिया है, जो पिछले कई वर्षों से देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारी और सार्वजनिक भूमि के मजहबी उपयोग को लेकर उठे हैं। छापे के दौरान मदरसे से कोई मान्यता या निर्माण संबंधी दस्तावेज पेश नहीं किए जा सके। परिसर की भूमि को लेकर विवाद है, जिसमें कि दारुल कुरान मदरसा मौलवी इसे वक्फ संपत्ति बता रहे हैं, जबकि राजस्व अभिलेखों के हवाले से इसे नजूल भूमि बताया जा रहा है। शहर के केंद्र में स्थित इस बहुमूल्य जमीन पर मीनारों सहित निर्माण और आंतरिक कार्य बिना नगर निगम की अनुमतियों के जारी रहने के आरोप हैं।

दरअसल, यह स्थानीय घटना किसी बड़े पैटर्न का हिस्सा लगती है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2018-23 अवधि की ऑडिट रिपोर्ट, जो फरवरी 2026 में मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश हुई, ने राज्य के 20 जिलों में करोड़ों रुपये मूल्य की 33 ऐसी संपत्तियों का खुलासा किया है, जो राजस्व अभिलेखों में सरकारी भूमि के रूप में दर्ज थीं, फिर भी वक्फ बोर्ड के नाम पंजीकृत कर ली गईं। इनमें स्कूल, पुलिस थाने, वन भूमि और सामुदायिक प्रयोजन के लिए आरक्षित क्षेत्र शामिल थे।

रिपोर्ट ने कलेक्टरों की अनदेखी और वक्फ अधिनियम के संभावित दुरुपयोग पर गंभीर टिप्पणी की गई, जिसमें कि ये नया मामला और यहां शहर के बीच में करोड़ों की अवैध निर्माण संपत्ति जैसी अनेक संभावित अन्य कई करोड़ की संपत्ति अलग सामने आ रही है। इसी बीच, 2015 से 2026 के बीच दिल्ली, प्रयागराज, कोलकाता, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अन्य स्थानों पर कोर्ट परिसरों, नगर भवनों, सरकारी अस्पतालों और कार्यालयों के अंदर नमाज़ पढ़ने, अनधिकृत मस्जिद निर्माण या मजहबी गतिविधियों से जुड़े कई मामले दर्ज हुए हैं।

ग्वालियर छापा: दस्तावेज नहीं, बच्चे रेस्क्यू, जमीन पर विवाद

मध्य प्रदेश राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की टीम ने हाल ही में ग्वालियर में एजी ऑफिस के पास स्थित दारुल कुरआन मदरसे में औचक निरीक्षण किया। शिकायत थी कि बिना उचित मान्यता के बच्चों को रखा जा रहा है। मौके पर 26 बच्चों को रेस्क्यू किया गया, जिनमें लड़कियां भी शामिल थीं। कुछ रिपोर्टों में बंद कमरों में बच्चियों के पाए जाने और सुविधाओं की कमी का जिक्र है। मदरसा प्रबंधन से मान्यता, रजिस्ट्रेशन और अन्य दस्तावेज मांगे गए, पर कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया जा सका।

इसके साथ ही परिसर के स्वामित्व और निर्माण को लेकर सवाल खड़े हो गए। संचालक पक्ष परिसर को वक्फ संपत्ति बता रहा है। दूसरी ओर, सरकारी रिकॉर्ड से नजूल भूमि होने की बात कही जा रही है। शहर के बीचोंबीच स्थित इस जमीन का मूल्य कई करोड़ है। मीनारों सहित निर्माण और आंतरिक कार्य बिना नगर निगम भवन निर्माण विभाग के दस्तावेजों के जारी रहना भी सामने आया है। आयोग की कार्रवाई बाल कल्याण से शुरू हुई, लेकिन जमीन आवंटन, अनुमति और कब्जे की जांच की मांग अब व्यापक हो गई है।

कैग रिपोर्ट का विस्तृत खुलासा

इससे पहले कैग रिपोर्ट सरकार के 2018 से 2023 के कार्यकाल से संबंधित है, जिसमें पहले ही बताया जा चुका है कि वक्फ की 81 संपत्तियों की जांच में 20 जिलों की 33 संपत्तियां (लगभग 41 प्रतिशत) ऐसी मिलीं, जो दस्तावेजों में सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज थीं, लेकिन वक्फ के नाम रजिस्टर्ड कर ली गईं। इनका कुल क्षेत्रफल 2,09,639.48 वर्ग मीटर था और अनुमानित मूल्य भी कई सौ करोड़ रुपये है। इनमें सामुदायिक प्रयोजन के लिए आरक्षित भूमि भी शामिल थीं। रिपोर्ट में आगर मालवा के सुसनेर क्षेत्र का जमुनिया गांव, अनूपपुर के कोटमा और बिजुरी, बालाघाट, भिंड का मेहगांव, भोपाल का हुजूर क्षेत्र, बुरहानपुर, छतरपुर, देवास और टीकमगढ़ जैसे स्थानों का उल्लेख है। भोपाल में मस्जिद हिनोतिया, मदीना मस्जिद महावड़िया, कब्रिस्तान कमलानगर और कानासेया आदि का जिक्र विशेष रूप से किया गया। बुरहानपुर की मदीना मस्जिद मदरसा, छतरपुर की वक्फ ईदगाह और दरगाह, देवास और टीकमगढ़ के कब्रिस्तान भी सूची में थे।

सबसे चौंकाने वाले मामलों में भोपाल के मिसरोद का उदाहरण है, जहां 3600 वर्ग मीटर भूमि को कब्रिस्तान बताते हुए नवंबर 2022 में वक्फ संपत्ति दर्ज किया गया, जबकि उसी जमीन पर सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल और मिसरोद पुलिस स्टेशन स्थित हैं। एक अन्य मामले में लीज पर दी गई भूमि को भी वक्फ में दर्ज किया गया, जबकि लीज शर्तों में स्वामित्व सरकार का ही बना रहना था।

कैग ने लिखा कि संबंधित जिलों के कलेक्टरों ने इन पंजीकरण प्रक्रियाओं को रोकने या निरस्त करने के लिए प्रभावी दिशा-निर्देश जारी नहीं किए। कुछ मामलों में आपत्तियां दर्ज की गईं, फिर भी पंजीकरण आगे बढ़ा। रिपोर्ट के अनुसार, कई संपत्तियों का पंजीकरण हाल के वर्षों में हुआ। दूसरी ओर सरकार ने जवाब में इसे तकनीकी त्रुटि बताया। कहा गया कि वक्फ अधिनियम 1995 में जिला प्रशासन से एनओसी लेने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है और राजस्व रिकॉर्ड के कंप्यूटरीकरण के दौरान स्वामित्व कॉलम में सरकारी दर्ज हो गया। कैग ने इस स्पष्टीकरण को खारिज करते हुए कहा कि हालिया पंजीकरण और आपत्तियों के बावजूद आगे बढ़ने की प्रक्रिया इसे सिर्फ तकनीकी गलती नहीं मानने देती। यह निगरानी और जवाबदेही की कमी का मामला है। रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जा चुके हैं। बजट अनियमितता, नियमित ऑडिट का अभाव और स्टाफ की कमी। 14 हजार से अधिक पंजीकृत वक्फ संपत्तियों में से कई ने लेखे-जोखे प्रस्तुत नहीं किए।

देश भर की प्रमुख घटनाएं

कलकत्ता उच्च न्यायालय : 30 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और जस्टिस ओम नारायण राय की डिवीजन बेंच ने संजय घोष की पीआईएल के बाद न्यायालय की छत का निरीक्षण करवाने का निर्देश दिया। पीआईएल में आरोप था कि वहां मुसलमान नमाज पढ़ रहे थे। निरीक्षण में कोई मस्जिद नहीं मिली, लेकिन एक बंद कमरा मिला जिसमें इस्लामी धार्मिक किताबें, गद्दे, कुर्सियां, स्टैंड फैन और अन्य सामान था। चाबियां वकील एजाज हुसैन के पास थीं। अदालत ने उनसे स्पष्टीकरण मांगा और सुरक्षा समीक्षा का आदेश दिया। पीआईएल में समान व्यवहार का सवाल भी उठाया गया था कि यदि एक तरह की प्रार्थना की अनुमति दी जा सकती है तो दुर्गा पूजा क्यों नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि छत पर मस्जिद नहीं बनी है।

जोशीमठ : चमोली जिले में निर्माणाधीन नगर भवन के हॉल में नमाज का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। बिल्डिंग स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट को टेबल टेनिस हॉल के लिए दी गई थी। म्युनिसिपल चेयरपर्सन ने रमजान के दौरान मौखिक अनुमति का दावा किया। बजरंग दल और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) जैसे संगठनों ने ज्ञापन देकर जांच और कार्रवाई की मांग की।

सहारनपुर : उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जिला मजिस्ट्रेट ऑफिस कॉम्प्लेक्स के अंदर बनी कथित अवैध मस्जिद को स्थानीय अदालत ने गिराने का आदेश दिया। सिटी मजिस्ट्रेट ने जुलाई 2026 में इसे सरकारी जमीन पर अवैध घोषित करते हुए बेदखली और क्षतिपूर्ति का आदेश दिया। राशि लगभग 6.41 करोड़ रुपये थी। जिला न्यायाधीश ने सितंबर में अपील खारिज कर आदेश बरकरार रखा। बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय समन्वयक विकास त्यागी की शिकायत पर कार्रवाई हुई, जिसमें बिना अनुमति निर्माण, व्यावसायिक गतिविधि और कमरे किराए पर देने का आरोप था। सितंबर 2026 में ध्वस्तीकरण हुआ। सुरक्षा और गोपनीयता को लेकर भी चिंता जताई गई थी।

कुशीनगर : जून 2024 में खड्डा इलाके के तुरकाहा गांव में सरकारी जमीन पर नमाज का वीडियो वायरल होने पर पता चला कि आगे की योजना बहुत व्यापक थी। इसी प्रकार से गुरुग्राम, उत्तर प्रदेश के कई अन्य क्षेत्रों, कनार्टक समेत कई राज्यों के मामले लगातार सामने आए हैं। जहां अवैध तरीके से सरकारी जमीनों को घेर कर बड़ी-बड़ी मस्जिदों एवं मदरसाओं का निर्माण कर लिया गया है।

विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल का कहना है कि यह समाज की चिंता और सरकार की स्वीकृति का मामला है। उन्होंने कहा कि अब तक निजी संपत्तियों को लेकर चिंता थी, लेकिन अब सरकारी संपत्तियों पर भी कथित इस्लामवादियों का नजर गड़ाए होने का प्रमाण सामने आया है। उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार से जांच कराने, अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और वक्फ से जुड़ी पूर्व संपत्तियों की भी समीक्षा की मांग की और मध्य प्रदेश बाल संरक्षण आयोग द्वारा जो मदरसा अवैध रूप से संचालित होता हुआ पकड़ा गया है, जहां से अन्य तमाम जानकारियां निकलकर बाहर आ रही हैं, उसी जैसे अन्य मदरसों पर भी शासन की ओर से सख्त कार्रवाई किए जाने की मांग की है। उन्होंने दिल्ली की 123 संपत्तियों का हवाला देते हुए बताया कि विहिप की मुहीम का ही यह परिणाम था जोकि न्यायालय के आदेश के बाद सरकार को उन्हें यहां रह रहे कथित इस्लामवादियों द्वारा लौटाना पड़ा था।

इस संबंध में वरिष्ठ एडवोकेट आशुतोष कुमार झा ने कहा कि नियम विरुद्ध दर्ज संपत्तियों को राज्य सरकार को वापस लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि कई सौ करोड़ की संपत्तियों का मामला शासन की तटस्थता की परीक्षा लेगा। मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सनवर पटेल से संपर्क करने का प्रयास किया गया, किंतु उनसे संपर्क नहीं हो सका।

ऐसे में कैग ने भी स्पष्ट कर दिया है कि कलेक्टरों की अनदेखी और विभागों के बीच समन्वय की कमी ने वक्फ अधिनियम के दुरुपयोग की स्थिति पैदा की। भूमि अभिलेख प्रणाली की विश्वसनीयता, पंजीयन विभाग, राजस्व विभाग और वक्फ बोर्ड के बीच सूचना आदान-प्रदान पर सवाल भी उठ रहे हैं। इन घटनाओं का सबसे बड़ा मुद्दा सार्वजनिक संपत्ति का कानूनी उपयोग है। सरकारी भूमि और संस्थागत स्थान अपनी कानूनी और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अधीन हैं। जब ऐसी जगहों पर मजहबी गतिविधियों या दावों पर सवाल उठते हैं, तो पारदर्शी जांच, कानून का लगातार इस्तेमाल और न्यायिक प्रक्रियाओं का सम्मान जरूरी है। कैग रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश में भूमि अभिलेख प्रबंधन, विभागीय समन्वय और संस्थागत जवाबदेही में सुधार की जरूरत को रेखांकित किया है। ग्वालियर के मामले में जमीन आवंटन और निर्माण दस्तावेजों की जांच जारी रखने की मांग है। देशभर में इसी तरह के मामलों में स्वामित्व रिकॉर्ड, अनुमति और निर्धारित उपयोग की जांच होनी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि देशव्यापी संदर्भ में वक्फ संपत्तियों की संख्या 8 लाख से अधिक और क्षेत्रफल लगभग 6 लाख एकड़ बताया जाता है। मध्य प्रदेश समेत कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और बिहार में भी स्वामित्व और लीज को लेकर बड़े विवाद रहे हैं। कई मामले उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय तक पहुंचे, जहां स्वामित्व निर्धारण साक्ष्यों और विधिक प्रक्रिया पर आधारित करने को कहा गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

Livevns.news Desk
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