हरियाली तीज से लेकर सावन के गीतों तक, महिलाओं के त्योहारों की अनोखी कहानी
सावन का महीना आते ही चारों तरफ हरियाली छा जाती है और हवा में एक अलग ही मस्ती घुल जाती है। यह महीना सिर्फ मौसम के बदलाव का नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए उल्लास, उमंग और लोक-संस्कृति का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। इस सुहाने मौसम में प्रकृति का श्रृंगार होता है, तो वहीं महिलाएं भी हरे-भरे कपड़े पहनकर, हाथों में हरी चूड़ियां सजाकर सोलह श्रृंगार करती हैं। सावन आते ही गांवों से लेकर शहरों तक लोकगीतों की गूंज सुनाई देने लगती है। नीचे लेख में जानें इस खास मौसम और महिलाओं के त्योहारों की कहानी, जो पीढ़ियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रही हैं।
हरियाली तीज सुहाग का पर्व
सावन के महीने में आने वाली हरियाली तीज महिलाओं के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होती है। यह त्योहार मुख्य रूप से पति की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं नए वस्त्र पहनती हैं, सोलह श्रृंगार करती हैं। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन माता पार्वती ने कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव को प्राप्त किया था।

सावन के पारंपरिक गीत और झूले की मस्ती
सावन के गीतों के बिना इस महीने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पुराने समय में जब मनोरंजन के साधन सीमित थे, तब सावन के गीत महिलाओं के लिए अपने दिल की बात कहने और भावनाओं को व्यक्त करने का मुख्य माध्यम हुआ करते थे।
महिलाएं पेड़ों पर डाले गए लंबी रस्सियों के झूलों पर बैठकर ऊंचे स्वर में सावन के मल्हार और कजरी गाती थीं। "सावन आया रे..." और "कजरी गीत" महिलाओं की टोलियों में आज भी पूरे उत्साह के साथ गाए जाते हैं। ये गीत न सिर्फ मौसम के सौंदर्य का बखान करते हैं बल्कि ससुराल की यादों और मायके के प्रेम को भी बहुत ही सुंदर शब्दों में बयां करते हैं।

मायके का बुलावा और सिंधारा भेजने की परंपरा
सावन के इस पावन अवसर पर एक और खूबसूरत परंपरा जुड़ी हुई है, वह है सिंधारे की। तीज से एक दिन पहले विवाहित महिलाओं के मायके से उनके लिए वस्त्र, श्रृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाइयां भेजी जाती हैं, जिसे सिंधारा कहा जाता है।
इसके साथ ही, इस पर्व पर महिलाओं को उनके मायके से बुलावा आता है। सावन के दिनों में मायके जाना और बचपन की सखियों से मिलना महिलाओं के लिए सबसे बड़ा सुख होता है। परिवार से दूर रहने वाली बेटियां जब सावन में अपने घर लौटती हैं, तो वह बहुत खुश होती है।

आधुनिक जीवनशैली में बदलता स्वरूप
समय के साथ भले ही हमारी जीवनशैली बदल चुकी है और गांवों के चौपालों की जगह अब फ्लैट्स और पार्कों ने ले ली है। मगर सावन त्योहार का असर आज भी महिलाओं के जीवन में उसी प्रकार है जैसे पहले हुआ करता था।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में महिलाएं ऑफिस और घर के तनाव को भूलकर इस त्योहार के पल को एक-दूसरे के साथ मनाती हैं। किटी पार्टीज और ऑफिस के कार्यक्रमों में हरी साड़ियां पहनना, मेहंदी लगवाना और सावन के गानों पर झूमना इस परंपरा को आधुनिक रूप में जीवित है। यह त्योहार हमें अपनी संस्कृति से जोड़े रखने का एक जरिया है।

